ओरछा 1: बुंदेलखंड की शानदार विरासत का बहुमूल्य नगीना है ये नगर

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मैं अक्सर अपने बुंदेलखंड के बारे में सोचता-रहता हूं, कभी यहां निरंतर पड़ने वाले सूखे के बारे में, तो कभी यहां के विशेष पर्वों के बारे में। मुझे लगता है कि बुंदेलखंड आज अपनी कला और संस्कृति में इतना परंपरागत है तो बुंदेलों-हरबोलों के वक्त में तो यह चरम पर रहा होगा। उस समय के बुंदेलखंड को किताबों में पढ़ा जा सकता है और यहां के किलों में महसूसा जा सकता है। बुंदेलों के इतिहास में ओरछा का नाम एक अमिट बानगी है। ओरछा बुंदेलखंड का वो तिकोना है, जहां पर किले ही किले हैं।

11 नवंबर 2018। मैंने एक रात पहले सोचा कि कल ओरछा जाना है। एक बुंदेलखंडी होने के बावजूद मैं ओरछा को कभी अच्छी तरह से नहीं देख पाया था। अब उस शहर और वहां की विरासत देखने की योजना बनाई। मेरे घर से ओरछा करीब 100 किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह 7 बजे मैं झांसी जाने वाली गाड़ी पर बैठा। मऊरानीपुर होते हुये साढ़े नौ बजे ओरछा तिगैला ’ऐसी जगह जहां तीन दिशा में रास्ते हों’ पर पहुंच गया। झांसी से ओरछा लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर है। जो भी लोग दिल्ली से ओरछा देखने आते हैं, उन्हें पहले झांसी आना पड़ता है।

ओरछा कूच

ओरछा तिगैला से ओरछा जाने के लिए ऑटो में जगह ली। ऑटो भरी हुई थी तो पीछे खड़े होकर जाना पड़ रहा था। बुंदेलखंड में गेट पर लटककर यात्रा करने वाला दृश्य आम है। मुझे जल्दी पहुंचना था इसलिए मैंने भी वही रास्ता अपनाया। सुबह-सुबह मौसम भी सुहाना था और रास्ता भी छायादार। रोड के दोनों तरफ बड़े-बड़े पेड़ लगे थे। ओरछा पहुंचने से पहले रास्ते में कई गांव मिलते हैं।

ओरछा का एक पुराना गेट।

थोड़ी देर बाद एक बड़ा-सा पुराना दरवाजा दिखता है। जो किसी समय नगर का प्रवेश द्वार रहा होगा। आज भी यही बड़ा गेट नगर का द्वार है। उसके बाद लगातार तीन बड़े गेट आते हैं। एक पर गणेश भगवान की मूर्ति उकेरी गई है। शहर में आते ही हम अचानक भीड़ से घिर गये। ओरछा देखने में बहुत छोटा-सा नगर है। कुछ घर हैं, कुछ होटल हैं, दूकानों की यहां भरमार है। लोग बड़े प्यारे हैं, वे ठगी से पैसा तो कमाते हैं लेकिन बात करने में घबराते नहीं है। छोटी जगह का यही फायदा होता है, बड़े शहर की तरह यहां डर नहीं होता है। सब पास-पास ही स्थित होता है।

बेतवा नदी पर घाट।

हम नगर को छोड़कर घाटों की तरफ बढ़ने लगे, जहां बेतवा नदी अपने तेज प्रवाह में बह रही थी। ओरछा में दो प्रकार के लोग आते हैं एक, किले की खूबसूरती को देखने आते हैं। दूसरा, धार्मिक आस्था जो रामराजा मंदिर के प्रति अगाध है। हम घाटों पर चलने लगे। बुंदेलखंड के घाटों की सबसे बड़ी कमी है, सफाई। एक बार बनने के बाद इसका रखरखाव सही से नहीं होता है। उसी गंदगी को पार करके हम पहुंचे, कंचना घाट।

बुंदेली प्रतीक

कंचना घाट, नगर का आखिरी पड़ाव है। उसके आगे नदी, जंगल और छोटे पहाड़ दिखाई देते हैं। सबसे ज्यादा भीड़ इसी जगह पर रहती है। अक्सर ओरछा आने वाले पर्यटक कंचना घाट नहीं आते हैं। मुझे लगता है कि किले को देखने के पहले उन्हें इसी जगह पर आना चाहिए। कंचना में सबसे खूबसूरत हैं राजाओं की छत्री।

बुंदेलों के राजाओं की छत्री।

गुंबदनुमे बड़े-बड़े टीले दिखाई देते हैं जिन्हें महल की तरह बनाया गया है। ऐसे ही 15 किले बने हुए हैं। सभी देखने में एक-दूसरे के कार्बन काॅपी। कुछ अलग है तो उनकी नक्काशी और अंदर बनीं चित्रकारी। छत्री का अर्थ होता है समाधि। कंचना घाट पर ओरछा के राजाओं की छत्री हैं। एक छत्री को राजा वीरसिंह ने बनवाया था, बाकी को मधुकर शाह ने। ये छत्री तीन मंजिला तक बनाई गईं थीं। इस समय उपर जाने का रास्ता बंद किया हुआ है।

जहां ये छत्री बनी हुई हैं। वहां आसपास का वातावरण बेहद खूबसूरत और मनमोहक है। चारों तरफ हरियाली है और रंग-बिरंगे फूल हैं। सबसे बड़ी बात यहां शांति है। किले से दूर होने के कारण यहां कम ही लोग आते हैं। बहुतों का तो इस जगह के बारे में पता ही नहीं है। राजाओं की छत्री को इत्मीनान से देखने के बाद हम किले की ओर बढ़ गये।

ओरछा किले में टूटी इमारत।

हम अपनी विरासत को नहीं बचा पा रहे

हम किले की ओर बढ़ गये। किले और शहर के बीच एक पुल है, बहुत चौड़ा और बहुत मोटा। इतना मजबूत है कि इसे आसानी से तोड़ा नहीं जा सकता। पुल उस समय की कारीगरी का एक बेहतरीन नमूना है। उसके आगे चलते हैं तो किले का भारी भरकम प्रवेश द्वार मिलता है। आज वो भारीभरकम गेट अपने भार की वजह से एक तरफ रखा हुआ है। ये गेट हमारे कच्चे घरों के उस दरवाजे की तरह हो गया है, जहां आना-जाना बहुत है इसलिए हमने उसको एक तरफ रख दिया है।

किले को देखने का टिकट मात्र दस रुपए का है। गेट पर गाइडों की भरमार है जो विदेशी पर्यटकों के साथ घूमते-बतियाते मिल जाते हैं। हम किले में घुसने के पहले उसके बाएं तरफ एक बोर्ड दिख गया। जिसमें लिखा था कि इस तरफ भी कुछ है। हम उसी रास्ते पर चल दिये। कुछ देर बाद एक बोर्ड दिखा ‘श्याम दउआ की कोठी’। अब कोठी खंडहर हो गई थी। उसके कुछ अवशेष  ही दिख रहे थे। आगे चले तो एक और कोठी दिखाई दी। ये कोठी सही-सलामत थी और अच्छी भी दिख रही थी। कमी थी तो बस लोगों के आने की।

इस तरफ कोई भी पर्यटक नहीं दिख रहा था। हम उस कोठी में चल दिए। ये छोटा-सा महल देखने में सुंदर था, यहां की दीवारें भी नक्काशी से पटी हुईं थीं। इसके दूसरी मंजिल पर गये तो वहां भी नक्काशी थी। जिसमें एक तरफ किसी राजा का चित्र था दूसरी तरफ नृतकी का। बाहर देखने पर लग रहा था, वहां कोई उद्यान रहा होगा, जहां राजा अपना कुछ समय बिताते होंगे। कुछ आगे चले तो ऊंटों को रखने का एक बड़ा सा महल दिखाई दिया। देखने पर लग रहा था कि इतना बड़ा तो राज दरबार ही हो सकता है। लेकिन बाहर लिखा था ‘ऊंटों को रखने की जगह’। हम वहां से आगे बढ़ गये उस किले की ओर, जहां पर्यटक सबसे पहले जाना पसंद करता है। ‘जहांगीर महल’।

(ये इस यात्रा का पहला भाग है, आगे यहां पढ़ें)


ये अलहदा सा यात्रा-वृतांत हमें लिख भेजा है ऋषभ देव ने। अपने बारे में वो बताते हैं, अपनी घुमक्कड़ी की कहानियां लिखना मेरी चाहत और शौक भी। जो भी देखता हूं, उसे शब्दों में उतारने की कोशिश में रहता हूं। कहने को तो पत्रकार हूं, लेकिन फिलहाल सीख रहा हूं। ऋषभ मूलतः वीरों की भूमि बुंदेलखंड से हैं।


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