पचमढ़ी यात्रा 2: शानदार नजारों से घिरा धूपगढ़

0
1087
views

पचमढ़ी हमें अपनी खूबसूरती से लगातार हतप्रभ कर रहा था। मध्यप्रदेश का एक नायाब हीरा है ये जगह। पचमढ़ी की पांडव गुफा से बाहर निकल कर हमने वहां के दूकान वालों से यहां के चर्चित वाॅटरफाॅल के बारे में जानना चाहा। अफसोस हम लेट हो चुके थे क्योंकि वहां जाने के लिए चार बजे से पहले पहुंचना होता है। आॅप्शन के तौर पर दुकान वाले ने हमें धूपगढ़ जाने के लिए बोला। धूपगढ़ सतपुड़ा की पहाड़ियों का वो सबसे खूबसूरत हिस्सा है जिसके बगैर आपका ये सफर अधूरा रहेगा। धूपगढ़ को पचमढ़ी में सनसेट-सनराइज पॉइंट भी कहा जाता है।

पहाड़ों के इस हिस्से से आपको उगते और ढलते सूरज का बेहद शानदार व्यू मिलता है। वॉटरफॉल के लिए तो हम पहले ही लेट हो चुके थे इसलिए हमने डिसाइड किया कि धूपगढ़ के साथ हम आज का सफर खत्म करेंगे। रास्ते में लोगों से पूछते और साइन बोर्ड पढ़ते हुए हमने धूपगढ़ के रास्ते पर अपनी गाड़ी दौड़ा दी। पहाड़ो के बारे में मैंने एक चीज जो यहां अकार सीखी, वो है साईन बोर्ड का महत्त्व। नोएडा और दिल्ली में रहते हुए साईन बोर्ड इग्नोर करने की आदत हो चुकी थी। पहाड़ों पर आपकी एक लापरवाही आपकी जान के लिए खतरा बन सकती है। धूपगढ़ के रास्ते में इक्का-दुक्का टूरिस्ट की जीप दिखी। जो शायद धूपगढ़ ही जा रहे थे।


धूपगढ़ से करीब 8 किलोमीटर दूर आर्मी का एक टोल गेट पड़ता है। जहां आपको गेट पास बनवाना होता है। गेट पर पहुंचकर हमने भी 100 रूपए का गेट पास बनवाया। गेट-पास बनवाकर हमने खाली सड़क पर सीधी फर्राट भरी क्योंकि आगे पहाड़ों का शानदार दृश्य हमारी आंखों के सामने था। कुछ किलोमीटर की दूरी और घुमावदार रास्ते को देखते हुए हम आगे बढ़ते रहे। दाईं ओर बड़े से बोर्ड पर लिखा था घाट प्रारंभ। मुझे इसका मतलब नहीं पता था। मुझे लगा, शायद कोई स्पेशल एरिया होगा।

खतरे से भरी चढ़ाई

आगे सनसेट पॉइंट से करीब दो किलोमीटर पहले दाईं ओर एक और बोर्ड नजर आया, जहां लिखा था सिर्फ चार पहिया वाहन आगे जाएं। यहां मैं थोड़ा हिचकिचाया। सोचा, शायद ट्रैफिक या बाइक वाले भीड़ न लगाएं, इस वजह से लिखा है। बाइक की तेज स्पीड के साथ हमें ऊंचाई का बिलकुल भी अंदाजा नहीं लगा। आगे जब एक पॉइंट बाइक बिलकुल सीधे स्लोप पर पहुंच चुकी थी और बाइक का आगे बढ़ना बिल्कुल नामुमकिन हो गया था। इंजन बंद कर एक बार पलट कर देखा तो हमारे तोते ही उड़ गए। तब हमें बिलकुल अंदाजा नहीं था कि इंजन बंद होने के साथ गाड़ी सीधे नीचे, कितने हजार फीट की गहराई में जा सकती थी।

ऐसे में अगर पीछे से कोई जिप्सी आ जाती तो शायद हम अपनी बाइक साइड भी न कर पाते। अब सबसे पहले हमारा काम था किसी तरह बाइक को अगले टर्न तक लेकर जाएं। आगे सिर्फ कुछ मीटर का ही रास्ता बचा था लेकिन ऐसी खड़ी चढाई देख कर हम सहम चुके थे। किसी तरह हिम्मत कर रास्ता पूरा किया उसके बाद चार पहिया वाहन आगे जाएं वाला बोर्ड ध्यान में आया जिसका मतलब सही था।

इतनी ऊंचाई पर सिर्फ जीप ही आ सकती थी। इसलिए एक लिमिट के बाद बाइक का आना मना था। इस किस्से के बाद मैंने जाना। क्यों पहाड़ों पर लगे साईन बोर्ड को हल्के में नहीं लेना चाहिए? खैर जैसे-तैसे हम सतपुड़ा की ऊंची पहाड़ियों पर पहुंचे। जहां धुंध भरे बादलों के बीच झांकती पहाड़ो की हरियाली का भव्य दृश्य हमारी आंखों के सामने था। कुछ समय वहां बिताने के बाद ढलान वाले रास्ते से सीधा पचमढ़ी के मुख्य बाजार में आ पहुंचे।

हमारा सफर सतपुड़ा के पांडव गुफा से लेकर धूपगढ़ की शानदार पहाड़ियों तक पहुंच गया था। अब हमें तलाश थी एक होटल की। छोटा हिल स्टेशन होने के कारण पचमढ़ी में आपको आसानी से अलग-अलग और बेहद किफायती रेंज में होटल मिल जाएंगे। जिनमें 300 रूपए की डॉरमेट्री से लेकर 5000 के शानदार होटल शामिल हैं। अगले दिन सुबह होने के साथ हमने जहां जाने के प्लान बनाए थे। वो सब बिगड़ते हुए नजर आ रहे थे क्योंकि असली मसला था कैश का। ऊंचाइयों में बसे होने के कारण पचमढ़ी के ज्यादातर एटीएम मूकदर्शक बनकर खड़े हुए थे।

अब हमें गाड़ी के पेट्रोल के साथ होटल को पेमेंट भी करना था। जो बिना कैश के संभव नहीं था। वैसे तो डिमॉनेटाईजेशन के बाद से इस तरह की मुश्किलें नई नहीं थी लेकिन यहां इस तरह की कैश की दिक्कत एक बड़ी समस्या थी। इंटरनेट न होने की वजह से यहां ऑनलाइन पेमेंट और डिजिटल इंडिया का जादू भी नहीं चल पा रहा था।

आखिर में लक्ष्मी का जुगाड़ जहां हुआ, वो था महालक्ष्मी मेडिकल स्टोर। पचमढ़ी के लोकल इस समस्या से बखूबी वाकिफ है इसलिए उन्होंने इसका भी जुगाड़ निकाल रखा है। इत्तेफाक से मेरे पास एसबीआई का एटीएम था। महालक्ष्मी वाले को मैंने एटीएम टू एटीएम पैसे ट्रान्सफर किए और उनसे कैश ले लिया। इस काम के लिए वो सज्जन 10 फीसदी सर्विस फीस लेते हंै। मुसीबत के ऐसे समय में वो 10 फीसदी हमारे लिए कुछ नहीं थे। ये टूरिस्ट प्लेस था इसलिए इस तरह के जुगाड़ होने भी जरूरी थे। वरना लोगों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

( ये प्रशांत की पचमढ़ी यात्रा का दूसरा भाग है, पहला भाग यहां पढ़ें  और तीसरे भाग में प्रशांत के साथ पचमढ़ी की पहाड़ियों पर बने चौरागढ़ मंदिर घूम आइए.)


यह भी पढेंः

जब पहली बार राफ्टिंग करते हुए मैं नदी में उछलकर गिर पड़ा…

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here