बनारस जाकर ‘कांठवाला’ मंदिर नहीं देखा तो क्या देखा

0
1318
views

बनारस एक ऐसा नाम है जो कि अपने आप में एक अलग दुनिया समेटे हुए है। भारत की सांस्कृतिक राजधानी के नाम से प्रसिद्ध बनारस को लोग घाट, गलियों, सांड़ के साथ ही इश्क के शहर के नाम से भी जानते हैं। ये मेरा खुद मानना है कि जो इस शहर में आ गया और चित से इस शहर की धूल को फांक लिया फिर वो यहां का ही होकर रह जाता है। क्योंकि इस शहर में प्रवेश द्वार है, निकास द्वार नहीं।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, राजा हरिश्चंद्र, छन्नूलाल महाराज, अप्पा, मुंशी प्रेमचंद सहित तमाम ऐसे नाम रहे हैं, जो बनारस के रस को अपने कला के माध्यम से दुनिया को पिलाकर अभिभूत किये हैं। बनारस की सुबह मंदिर के घंटी के बजने और राम नाम सत्य है, की आवाज से होती है। हर हर महादेव ही एक यहां की एक ऐसी क्रांति या धरोहर का नाम है, जिस पर सबका कॉपीराईट है।

दिलरुबा गंगा

जहां झुन्ना काका 56 के उमर में भी अपने कलुआ (कुत्ता) के साथ दशाश्वमेध घाट से पैदल ही अस्सी, काशी के यहां चाय पीने चले आते हैं। चाय पीना तो महज एक बहाना है, झुन्ना काका तो राजनीति में हो रहे उथल पुथल के नब्ज टटोलने आते हैं। भोसड़ी शब्द काशी की पारम्परिक गाली है, जिसमें ननद-भौजाई वाला प्यार है, अगर कोई नया  इस शहर में आता है और इसे गाली कहता है, तो एक स्वर में पूरा बनारस बोलता है की कौन भोसड़ी के गाली बोललस हौ।

घाटों के बीच स्थित (दशाश्वमेध घाट) नेपाल के पशुपतिनाथ जी का मंदिर अपने आप में दिलचस्प है, ये आपको 19 वीं सदी के काल में ले जाती है। यह मंदिर नेपाली वास्तुशैली में बना है, यह बनारस में स्थापित पुराने भोले बाबा (शिव) के मंदिरों में से एक है। नेपाल के राजा राणा बहादुर शाह ने जब बनारस में निर्वासन लिया, तो नेपाल में स्थापित शिव मंदिर (पशुपतिनाथ) के तर्ज पर यहां भी शिव मंदिर हूबहू नेपाली वास्तुशैली के आधार पर बनवाने का निश्चय किया, उनके निर्वासन के दौरान मंदिर का निर्माण कार्य शुरू तो हो गया पर इसे पूरा होने में पूरे 30 साल का वक्त लग गया।

मंदिर का एक हिस्सा

मंदिर के निर्माण कार्य के दौरान ही राजा राणा बहादुर शाह नेपाल को लौट गए जहां उनकी हत्या उनके ही सौतेले भाई शेर बहादुर शाह द्वारा चाकू मार कर ,कर दी गई, उनकी मृत्यु के बाद मंदिर को उनके पुत्र गिरवान युद्धा बिक्रम शाह देव ने समय सीमा के 20 साल बाद बनवा कर पूरा किया। लकड़ी से बने होने के कारण ‘कांठवाला मंदिर’ भी कहते हैं, इस मंदिर के निर्माण में लकड़ी के साथ साथ टैराकोटा और पत्थर का भी इस्तेमाल किया गया है, तब जाकर नेपाली वास्तुशैली की इसमें पारदर्शिता आई है।

मंदिर परिसर में एक महिला

यह रचना नेपाली कारीगरों की उत्कृष्ट शिल्प कौशल को बखूबी दर्शाती है, इसलिए यह मंदिर बनारस के कुछ खास मंदिरों में से एक है। इसे ‘छोटा खजुराहो’ भी कहा जाता है, क्योंकि यहां जो भी मूर्तियां खुदी हुई हैं वे खजुराहो स्मारक के समान दिखती हैं। लकड़ी की बनी होने के बावजूद यह दीमक मुक्त है, सुबह दर्शन के दौरान सूर्य की गेरुआ किरणें स्वागत करने को आती है, तो रात की शांति गंगा के आगोश में खुद ब खुद खींच ले जाती है।

शहर बनारस की खूब सारी कहानियों के साथ मिलूंगा फिर कभी। तब तक के लिए, हर हर महादेव।


बनारस सच में इश्क है, एक ऐसा शहर जो एक कतई अजनबी इंसान को भी कुछ ही घंटों में अपना और सिर्फ अपना बना लेता है। दिलकश बनारस के इस खूबसूरत रंग के बारे में हमें लिख भेजा है अमित मीरा सिंह रघुवंशी ने। अमित शोधार्थी हैं। लिखने-पढ़ने का घणा शौक है, खूब बढ़िया फोटो खींचते हैं। उनसे अपने बारे में और बताने को कहो तो कहते हैं कि गलियों में घूमने वाला अवारा अपने बारे में क्या बताए। 


ये भी पढ़ें:

गंगा को मां बोलने से पहले वरुणा की मरती सांसें तो सुन लो

क्या हुआ जब देर रात बनारस के घाट पर निकलीं दो लड़कियां

लड़कियों की आवाज सुन जगता है बनारस

बनारस के घाटों पर बसा कोरियन कुजीन

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here