छाऊ नृत्य: शराबियों के बीच फंसकर रह गई है एक विश्वस्तरीय लोककला

0
1041
views

छाऊ नृत्य, बरसों पहले किसी एक कम प्रसिद्ध लेकिन तथ्यपरक मैग्जीन में इसके बारे में पढ़ा था। उस वक्त तक भारत के नक्शे के अलावा तमाम राज्यों के बारे में कोई समझ नहीं थी। फिर थोड़ा बड़े हुए, भ्रमण पर निकलना चालू हुआ। भारत को करीब से जानने की हूक पश्चिम बंगाल में ले गई। लोक संस्कृति और कलाओं में विशेष रुचि ले आई पुरुलिया जिले के एक सुदूर गांव में। ये जिला ही क्यों चुना अवलोकन के लिए, वजह था छाऊ नृत्य।

थोड़ी सी रिसर्च ने हमें बता दिया था कि छाऊ के तीन प्रकार वर्तमान समय में मौजूद हैं; सरायकेला छाऊ, पुरुलिया छाऊ और मयूरभांज छाऊ। इस तरह से छाऊ क्रमशः तीन राज्यों में फैला है, झारखंड,प. बंगाल और ओडिशा। छाऊ के पहले दो प्रकारों में मास्क का इस्तेमाल होता है जबकि मयूरभांज में बिना मास्क के ही कलाकार परफॉर्म करते हैं। छाऊ नृत्य को यूनेस्को ने खतरे में पड़ी विरासत की सूची में डाला है। भारत की तरफ साल 2010 में ये यूनेस्को की सूची में पहुंचा।

पुरुलिया छाऊ नाच में इस्तेमाल होने वाला मुखौटा

जब हमारी मुलाकात हुई पद्मश्री नेपाल महतो जी से

तो छाऊ नृत्य की तलाश हमें ले आई आदाबोना नाम के एक गांव में। ये पुरुलिया जिले के बलरामपुर ब्लॉक के अंतर्गत आता है। यहां हमारी मुलाकात हुई छाऊ नृत्य के लिए पद्मश्री से सम्मानित श्री नेपाल महतो जी से। उन्होंने हमें बड़े ही सम्मान के साथ अपने घर में ठहराया। हमें पता चला कि गांव के जिस हिस्से में हम हैं उसे छो पाटी कहते हैं। ज्यादातर लोग यहां छाऊ कलाकार ही हैं। नेपाल मेहतो जी देखने में एकदम साधरण से इंसान हैं। उनके परिवार के लोग भी बहुत ही साधारण से ही हैं। पर एक आसाधारण बात थी जिसने हमारा दिल जीत लिया। आज भी वो लोग मेहमान को भगवान मानते थे। वरना कोई क्यों किसी अनजान को अपने घर में सहारा देगा। आवभगत ऐसी कि शहर वाले शरमा जाएं।

पद्मश्री नेपाल मेहतो

जब पहुंची ताड़ी पिए मर्दों के बीच दो लड़कियां

छाऊ नृत्य किसी विशेष पूजा के समय ही किया जाता है। उसी रात गांव में दो-दो मंडलियों के छाऊ नृत्य का आयोजन था। एक तो खुद नेपाल महतो की मंडली, दूजी प्रख्यात छाऊ कलाकार कृष्ण महतो की मंडली। हमारी तो लॉटरी लग गई मानो। इन तमाम खुशगवार बातों के बीच ये जानकर दुख हुआ कि रात के इस आयोजन में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर थी। रात के दस बजे हम महतो जी की छो गाड़ी में बैठ गए। हमने महतो जी की बहुओं को भी साथ आने के लिए कहा। पर उन्होंने आने से मना कर दिया।

पूरे गांव और आस-पड़ोस के गांवों के मर्दों ने गले तक ताड़ी चढ़ा रखी थी। सब नशे में धुत थे और छाऊ नृत्य के गानों को रिहर्स कर रहे थे। इन तमाम मर्दों के बीच मैं और मेरी दोस्त घुप्प अंधेरे वाली रात में छाऊ देखने निकल गए। चारों तरफ अंधेरा था और लाइट के नाम पर ट्रक की फ्रंट लाइट। गाड़ी आगे बड़ी कच्चे रास्ते में गाड़ी लड़खड़ा रही थी। बहुत मुश्किल से हम रास्ते को देख पा रहे थे। बहुत डरावना मंजर था। थोड़ी भी गाड़ी इधर-उधर होती तो हम किसी गड्ढे में गिरे मिलते। किसी तरह हम छाऊ नृत्य वाले स्थान पर पहुंचे। मंच के नाम पर चार बांस थे, जिनपर ट्यूबलाइट लगे हुए थे। दो-तीन बड़े स्पीकर लगे थे।

कृष्ण महतो

जिस कला के चर्चे देश विदेश में है उसकी बागडोर कुछ शराबियों के हाथों थी। किसी कला का ऐसा विनाश बहुत ही दुःखदायी है। महिलाओं के नाम पर हम केवल दो लड़कियां ही थीं वहां। माना जाता है कि पहले महिला भी यह नृत्य करती थी पर शादी के बाद उनके लिए थोड़ा मुश्किल हो जाता था। इसलिए अब महिलाएं इस नृत्य से नदारद थीं। जब आजादी की बात होती तो सबसे पहले वो मर्दों को ही क्यों हासिल होती है। क्या उस गांव कि महिलाओं का अधिकार नहीं कि वो भी छाऊ नृत्य देखे, इस विरास्त का मजा ले सके। शर्म-लिहाज हमेशा महिलाओं के दामन में ही क्यों आते हैं। क्या पुरूषों का ये कर्तव्य नहीं की वो भी समाज को इतना सुरक्षित बनाए कि कोई भी महिला जब चाहें घर से निकल सकें।

खैर हमें देख कर वहां मर्द भी काफी आश्चर्यचकित थे। हम जिस ट्रक में बैठे थे, उसके आगे पीछे घूमघूम कर हमें देखने की कोशिश कर रहे थे। पर नेपाल मेहतो जी का लोग वहां बहुत सम्मान करते थे। इसलिए वो लोग हमसे कुछ कहने से डर रहे थे। कलाकार गाड़ी के चारो तरफ कपड़ा बांध कर तैयार हो रहे थे। एक ट्रक मुखौटों से भरा हुआ था। लोग मंच के चारों ओर जमा हो गए।

गणेश का रूप धारण करे नाच करता कलाकार

पहली नजर में ही छाऊ नृत्य बहुत ही आकर्षक लगता है। लगभग एक ही साथ इतने सारे रंग। उसके साथ ये आश्चर्य भी होता है कि इतनी भारी पोशाक के साथ कोई कैसे नाच सकता है। नाचना तो एक बार ठीक भी है पर करतब करना तो बिल्कुल चौंकाने वाली बात थी। भारी-भरकम पोशाकों के साथ कई किलो के लंबे-चौड़े मुखौटे होते हैं।

इस नृत्य का प्रारंभ कब हुआ, ये कोई भी नहीं बता सकता। पर माना जाता है जब सम्राट अशोक ने कलिंग पर चढ़ाई करने की ठानी तो कलिंग के राजा ने सभी को युद्ध कला सीखने के लिए कहा। बुजुर्गों, स्त्रियों या बच्चों, सभी को युद्ध का प्रशिक्षण दिया जाने लगा। इसी युद्ध कला ने बाद में एक नृत्य का रूप ले लिया।  उसके ऊपर से पोशाक का भार। नाचने तक तो ठीक लगता है। पर जब कलाकार करतब करने लगते हैं तो किसी कि भी आंखे फटी की फटी रह जाती है।

दुर्गा के रूप में एक कलाकार

मध्यरात्रि को जब नाचते हैं भगवान

पुरुलिया छाऊ की शुरुआत अखा वंदना से होती है। जिसमें शहनाई, धूमसा, ढोल बजाते हुए लोग मंच पर आते हैं। छाऊ नृत्य के मुख्य भाग की शुरुआत का समय हो गया था। लोग टकटकी लगा कर बैठे हुए थे। तभी मंच की एक ओर से भागते हुए भगवान गणेश आते हैं। कंधो को हिला-हिला कर पांव को पटक पटक कर भाव प्रकट करते हैं। साथ ही साथ लोकगीत गाते अद्भुत गायकों की आवाज से उस नृत्य में प्राण आ जाते हैं। शरीर पर रंग बिंरगी पोशाक, चेहरे पर मुखौटा। पैरों पर बंधी गर्म पट्टी। बीच-बीच में पीछे से डायलॉग डिलीवरी भी हो रही थी। जिस पर गणेश जी एक्ट कर रहे थे। बार-बार आगे बढ़ते और गोल गोल चक्कर खा कर घुटनो के बल कूद पड़ते।

थोड़ी देर में दो सुंदर लड़कियां आयीं (लड़कियों का भेष में लड़के)। नृत्य और एक्सप्रेशन में उनका कोई जवाब नहीं था। नजाकत और अंदाज ऐसा कि किसी का दिल जीत ले। फिर शुरू हुआ महिषासुर मर्दन की कहानी। महिषासुर देखने में बहुत डरवाना था और उससे भी ज्यादा डराने वाला थी उसके हावभाव। कहानी चलती रही। मंच पर शिव, विष्णु, ब्रह्मा, दुर्गा, और राक्षसों की सेना भी थी। अगली कहानी थी कृष्ण द्वारा असुर वध की। हिंदीभाषी होने के कारण हमें बांग्ला भाषा समझने में दिक्कत तो हो रही थी, लेकिन कलाकारों के दमदार अभिनय, भाव-भंगिमाओं ने हमारे लिए सब आसान कर दिया था।

3 बजे तक हम टकटकी लगा कर नृत्य देखते रहे। कुछ समय के लिए तो कैमरा छोड़ कर बस छो देखने के लिए बैठ गए। कभी-कभी नृत्य इतना सजीव हो जाता था कि मैं और मेरी दोस्त ताली बजाए और हूटिंग किए बगैर रह ही नही पाते। कभी-कभी लोग नृत्य के बीच आ कर कलाकारों के हाथों में 10-20 रुपए पकड़ा देते। हमारे अलावा कोई भी दर्शक इतना उत्साहित नजर नहीं आया। शायद ये उनके लिए ये रोज की बात होगी। निर्जीव वस्तुओं की तरह बस चुपचाप लोग बैठे रहे। मैं यही सोचती रही क्या इतना ठंडा रिस्पॉन्स देख कर कलाकारों के मनोबल कमजोर नहीं होता। शायद दोनों को ही अब असर नहीं पड़ता।

भारत में क्यों दम तोड़ रही लोक कलाएं

छाऊ को देख कर लगा जैसे कितना कुछ मैंने अभी देखा नहीं है। छाऊ जैसे कितने ही लोक कलाएं होंगी जिनके बारे हम जानते ही नहीं होंगे। जिन कलाओं का डंका विश्व भर में बजता है, उनके बारे में हमारे देश के लोग कितना कम जानते हैं। जीवन यापन करने के लिए सरकार से मिलने वाला नाममात्र का भत्ता। उस पर भी महिलाओं को इन लोक कलाओं से दूर कर दिया गया है। तभी तो बड़े मंचो की जगह छोड़ कर ये लोककलाएं शराबियों के बीच आ गयी है। जिन कलाओं के चर्चे गली-गली में होने चाहिए, वो ऐसे आधी रात के अंधेरों के बीच खुद को जिंदा रखने के लिए मजबूर हैं।

गायक-मंडली

अभी भी वक्त है हम अपनी लोक कलाओं को तड़पकर मरने से बचा सकते हैं। जब भी आप कहीं घूमने जाएं तो केवल टूरिस्ट स्पॉट तक सीमित न रहें, वहां की लोक कलाओं को जानने-समझने के लिए भी वक्त निकालें। जानने की कोशिश करें कि वहां के कलाकारों के हाल क्या हैं। हम सब रोजाना ही सोशल मीडिया पर कितना कुछ तो लिखते हैं, दो शब्द इनके लिए भी लिखें। ताकि हम सब जुड़ सकें असली भारत से, गर्व कर सकें अपनी महान परंपराओं पर, अपना सकें अपनी खूबसूरत कलाओं को।


ये भी पढ़ें:

वो मंदिर जहां का पानी पीकर ठीक हो गया था औरंगजेब का सेनापति

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here