राजस्थान 2: अपने प्रियतम इतिहास की ओढ़नी आज भी ओढ़े हुए हैं ये शहर

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जयपुर में खूबसूरत आमेर किला और जलमहल देखने के बाद हम पहुंचे हवामहल। सच में वो बहुत खूबसूरत था भी। मुझे आज भी याद है बचपन में एक कॉपी खरीदा करता था। जिस पर हवामहल लिखा होता था और एक सुन्दर सा चित्र भी बना होता था। जिस तस्वीर को हमेशा काॅपी में देखता था, आज उसी तस्वीर को सामने देख रहा था।

इन इमारतों को देख कर लगता है कि सच में राजपुताना ठाठ अपने आप में नायाब है। जयपुर से हमने अपने कदम बढ़ाये अजमेर की ओर। वहां पहुंच कर राज्य सरकार के अतिथि गृह में रात गुजारी। सुबह होते ही हम निकल पड़े अजमेर शरीफ दरगाह की ओर।

हवामहल।

अजमेर शरीफ

इस बार कोई बताने वाला नहीं था कि इस जगह में क्या खास है? ये किस लिए प्रसिद्द है। तो क्या हुआ, सब कुछ बताने वाले गूगल बाबा हमारे साथ ही थे। गूगल बाबा की सहायता से पता चला कि वहां जोधा-अकबर फिल्म के कुछ दृश्य फिल्माए गए थे। हम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे भारी भीड़ दिखनी शुरू हो गई थी। आसपास भक्ति का माहौल और लोगों की भावनाएं हमें उनकी तरफ आकर्षित कर रहीं थी।अढ़ाई दिन का झोपड़ा

दरगाह के बाद हम पहुंचे अढ़ाई दिन के झोपड़े पर। ये जगह दरगाह से कुछ ही दूरी पर है। यहां आराम से पैदल जाया जा सकता है। यह भी एक प्रकार की मस्जिद है। इसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था। कहा जाता है कि यहां चलने वाले अढ़ाई दिन के उर्श के कारण इसका नाम पड़ा।

हम वहां से टैक्सी में बैठ कर अजमेर बस अड्डे की ओर चले पड़े। रास्ते में मुझे काफी पहाड़ दिख रहे थे। एक पल को तो मुझे यकीन नहीं हुआ कि क्या हम सच मे राजस्थान में ही हैं? हम बस स्टैंड से पुष्कर जाने वाली बस पर बैठे। मेरे साथ शशांक था, जो बगल वाली सीट पर बैठा था। जैसे-जैसे बस पुष्कर की ओर बढ़ रही थी लग रहा था हम शिमला या मंसूूरी के रास्ते में हैं। क्योंकि ऐसे पहाड़ और उन पहाड़ों की घुमावदार सड़कें बिल्कुल किसी पहाड़ी क्षेत्र की अनुभूति करवा रहीं थी।

पुष्कर

थोड़ी देर बाद खिड़की से बाहर झांकने के बाद शशांक से मैंने गाना सुनने की इच्छा जाहिर की। जिसके बाद बाकी का सफर खिड़की से प्रकृति को निहारते और संगीत सुनते हुये बीता। पुष्कर पहुंच कर सबसे पहले गन्ने का रस पीकर थकान दूर की और चल दिए विश्व के एकमात्र ब्रह्माजी के मंदिर की ओर।

ब्रह्मा मंदिर

हम जैसे ही मंदिर पहुंचे तो पता चला कि मंदिर का दरवाजा बंद होने में बस 2 मिनट बचा है। प्रसाद वाले ने हमें कहा कि जल्दी से प्रसाद लो और अंदर जाकर दर्शन कर लो, पैसे लौटकर दे देना। इतना सुना कि हमने दौड़ लगा दी और पहुंच गए मंदिर के भीतर। मंदिर बेहद खूबसूरत है। इससे भी बढ़कर है लोगों की आस्था और विश्वास।

मंदिर में मैंने एक खास बात पाई कि मंदिर को बीच में सफाई के लिए पूरा खाली करवा दिया जाता है। इसलिए आप जब भी जाएं समय का ध्यान रख के जाये। मंदिर दर्शन के बाद निकट में ही स्थित सरोवर पर पहुंच गए। सफाई क्या होती है? वह हमें सरोवर भली भाँति समझा रहा था।

सरोवर के किनारे-किनारे खूबसूरत प्राकृतिक दृश्य उसकी खूबसूरती पर चार चांद लगा रहे थे। अब लगभग हमारी यात्रा पूरी होने को थी और दिल्ली वापस आना था। तो सबसे पहले सरोवर से निकल कर हमने राजस्थानी खाने का स्वााद लिया, खाना वाकई में बहुत ही स्वादिष्ट था।

टीवी के बहुचर्चित सीरियल ‘दिया और बाती हम’ के कुछ दृश्य यहीं पुष्कर में फिल्माए गए थे। इसी कारण से यहां एक गली का नामकरण ही हनुमान गली हो गया है क्योंकि हनुमान गली को सीरियल में दिखाया गया था। इसके बाद हम दिल्ली की ओर लौट चले। अगले दिन से हमें फिर से पुरानी दिनचर्या में लौटना था लेकिन ये राजस्थानी यादें अब हमेशा जेहन में रहने वाली थीं। अब से राजस्थान दिल में हमेशा रहेगा।

ये इस यात्रा का दूसरा और आखिरी भाग है, पहला भाग यहां पढ़ें)


 

ये रोचक यात्रा वृतांत हमें लिख भेजा है राघवेंद्र उपाध्याय ने। राघवेंद्र पत्रकारिता के छात्र हूैं। अपने बारे में जब चार लाइन में लिख भेजने को हमने उन्हें बोला, तो वो बोले, घूमने फिरने का शौकीन हूं, तो जब भी वक्त मिलता है निकल पड़ता हूं। दृश्यों को आंखों से नहीं अंतर्मन से भी देखने की कोशिश करता हूं, कैमरे से परहेज़ है, आंखों में कैद करने में यकीन रखता हूं।


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