हम अपनी विरासतों के प्रति कितना उदासीन हैं, राजनगर आकर पता चलता है

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जवानी में कितना खूबसूरत रहा होगा राजनगर

30 दिसंबर 2017, दरभंगा। सुबह सवा पांच बजे बाबूजी की आवाज, राजनगर जेबै अहां! ठंड बेसी छैक हम त’ कहब नहि जाऊ (राजनगर जाओगे तुम! ठंड अधिक है मैं तो कहूंगा मत ही जाओ)। मैंने मोबाइल में गंगासागर ट्रेन को देखा, कहां तक पहुंची है? करीब एक घंटे लेट थी। मैंने आधे घंटे की नींद और ली। फिर उठा और भागा स्टेशन। दरभंगा जंक्शन से 49 किलोमीटर दूर है राजनगर।

साढ़े आठ बजे करीब राजनगर स्टेशन पर था जहां से राजनगर पैलेस करीब ढाई किलोमीटर है। मैं स्टेशन पर चाय के साथ बिस्किट खाकर निकलने लगा। मैंने कुल 4 लोगों से पैलेस का पता पूछा किसी को पता नहीं लेकिन मुझे पता, पता था। करीब 7 डिग्री तापमान और घोर कुहासा। मन में यही ख्याल आ रहा था कि अगर धूप नहीं निकली तो आने का क्या फायदा, कुछ देख भी नहीं पाउंगा।

राजनगर रेलवे स्टेशन

30 मिनट पैदल चलने पर किले के करीब था। कुछ लोग परिसर साफ करने में लगे हुए थे। आगे बढ़ा और लोग मिले। ये सारे लोग एसएसबी 18 बटालियन से थे। बटालियन के प्रमुख अजय जी से बात हुई तो कहा कि मैं 12 दिन पहले ही पोस्टेड हुआ हूं। सुना है 1 जनवरी को बहुत सारे लोग इधर आते हैं तो सफाई अभियान चला रहे हैं। 18 बटालियन 2006 से अस्थायी तौर पर राजनगर किले के परिसर में है। बता दूं कि यहां से भारत-नेपाल सीमा सिर्फ 20 किलोमीटर है।

एसएसबी बटालियन का यही गेट है जहां से सामान्य नागरिक अंदर नहीं जा सकते हैं

राजनगर पैलेस के बारे में जान लें

राजनगर पैलेस, राज दरभंगा के महेश्वर सिंह के छोटे बेटे रामेश्वर सिंह के लिए बनवाया गया था। राजनगर को बसाने की शुरुआत 1890 के करीब हुई थी और 1905 में किला बनना शुरू हो गया था जो 1926 तक चला। बड़े भाई के मौत के बाद इन्हें दरभंगा का राजा बनना पड़ा। इन्होंने दरभंगा राज की राजधानी को राजनगर ले जाने की कोशिश की लेकिन कई कारणों से ऐसा नहीं हो सका। इसमें कारण कमला नदी में आई भीषण बाढ़ से कटाई भी एक मुख्य कारण था। 1929 में इनकी मौत हो गई।

जो बचा हुआ है उसे बचाने की कोई कोशिश नहीं है

राजनगर परिसर बनने के 8 साल बाद 15 जनवरी 1934 को उत्तर बिहार और नेपाल के तराई क्षेत्र में भयंकर भूकंप आया जो इस क्षेत्र में आज तक के इतिहास का सबसे बुरा भूकंप माना जाता है। इस भूकंप की तीव्रता 810 थी। राजनगर पैलेस बनने के 8 साल बाद बिखरने लगा। शहर गुलजार होने से पहले बर्बाद हो गया। परिसर में कुल 11 मंदिर हैं, नौलखा पैलेस है और अब इनके खंडहर। बाद में राजनगर क्षेत्र रामेश्वर सिंह के छोटे बेटे बिशेश्वर सिंह को सौंपा गया और बिशेश्वर सिंह के तीनों बेटों ने राजनगर का बहुत सा हिस्सा बेच डाला। फिर देश आजाद हुआ और अब खंडहर भी मिट्टी में मिलने के कगार पर है।

नौलखा पैलेस की दीवारें
खंडहर
बारीकियां देखिए
अवशेष ही शेष है अब
शिव मंदिर है और सही सलामत भी। ग्रामीण कहते हैं अमावास की रात इसकी खूबसूरती देखने लायक होती है
तालाब के दूसरे छोर से राजनगर का किला

दिल छू लेना वाला ये आर्टिकल हमें लिख भेजा है आदित्य झा ने। आदित्य झा पत्रकार हैं। अभी हाल ही में, एक बहुत ही पुरानी लेकिन दिलचस्प जगह घूमने गए थे। वहीं से प्रेरित हो कर हमें लिख भेजा था ये आर्टिकल। आदित्य झा ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है, उधर मन नहीं लगा तो इधर आ गए। बिहार से हैं। मैथिली भाषा में एक वेबसाइट भी चलाते हैं। सेंस ऑफ ह्यूमर बड़ा खराब है, खुद ही जोक मारकर खुद ही हंस लेते हैं। इंसान बड़े प्यारे हैं, महत्तवपूर्ण सुझाव देते हैं, जरूरत पड़ने पर साथ खड़े रहते हैं। 


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