रामपुर के ‘डीआईजी’ चायवाले की मजेदार कहानी

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दिल्ली से मुझे कभी इश्क न हो पाया। ये हमेशा से मुझे बेवफा मोहब्बत के सिवा कुछ न लगी। दिल्ली को भोगकर निकल जाने की फितरत घर कर गयी है मुझमें। इसलिए अब मैं जल्दी ही इससे ऊबकर निकल जाने की फिराक में लगा रहता हूं। इस बार कुछ ज्यादा ही ऊबकर मन खिन्न हो गया था। मैंने झटपट निकलना चाहा क्योंकि इस वक्त मुझे पैसों की भी ज्यादा किल्लत हो गयी।

इस तनाव भरे माहौल में मैंने तनाव को ही तनाव देने की ठानी और गरीबी में उल्टे कुछ पैसे उधार मांगकर घूमने निकल पड़ा। इसके लिए मैंने ब्रितानी हुकूमत की गुलामी से मुक्त रियासत रामपुर का रुख किया और फिर वहां से नैनीताल। उधारी इतनी ज्यादा भी न मिल पायी थी इसलिए आगे के खर्चे अधिक होने के कारण रामपुर कोर्ट में तैनात मेरे वाइट कॉलर दोस्त उमेश पटेल ने मेरे खर्चों को वहन कर डाला। ‘जहां चाह-वहां राह’ की नजीर मेरे लिए सच हो गयी थी ।

खैर, इस वक्त छह जनवरी की धुंधली सर्द भरी शाम ढले मैं दिल्ली से निकला रामपुर बस स्टॉप पर खड़ा था। यहां से मैंने अपने दोस्त उमेश को फोन लगाया और उसके कमरे आने का निर्देशन मांगा। उसने मुझे कचहरी के दूसरे नम्बर वाले गेट के सामने DIG चाय वाले के यहां तक रिक्शे से आने को कहा। ‘DIG चाय वाला’! हू-ब-हू ऐसे ही, जैसे आपकी भौंहें तन गयी हैं इस नाम को सुनकर ठीक वैसे ही मैंने भी अपनी भौंहों पर बल दे डाला था उस वक्त।

ये नाम और इसमें छिपे दो बिंबों DIG और चाय वाला रह-रहकर मेरे दिमाग में कौंधने लगे। बस-अड्डे से कचहरी मैं एक गहरी सोच में ही आ धमका । रिक्शे वाले के ‘साहेब DIG चाय खिन लिआये गइन..’ कहते ही मेरी सोच शिथिल हुयी और मैंने अपनी नजरें ऊपर कीं तो देखा कसा हुआ मोटा-काला कोट-पैण्ट और हाथों में ऊनी दस्ताने पहने स्मार्ट सा लड़का मेरे सामने हाज़िर था जिसने झट से मेरे बैग का कंधा बदल दिया था । घण्टों से मेरे कंधे से चिपका बैग अब उमेश के कंधे पर और भी जच रहा था ।

हम उमेश के कमरे पर पसरे चाय की चुस्कियों के मौज ले रहे थे । उमेश के सहकर्मी दो-चार और दोस्तों का जमावड़ा भी उस कमरे पर था । मैंने सबका ध्यान अपनी ओर खींचकर जानना चाहा कि DIG चाय वाले को DIG चाय वाला ही क्यों कहते हैं, आखिर इस नाम के पीछे की कहानी क्या है ? उमेश सहित उसके सभी दोस्त एक ही नाके से निकल गये । वो नाका हंसी भरे आश्चर्यबोध का था जिसके आगे नकार का रास्ता था ।

अगली रात नौ बजे मैं उमेश के साथ DIG चाय वाले की दुकान पर उसकी चाय का गिलास थामे बिल्कुल DIG चाय वाले के छह फिटे बदन के सामने ही खड़ा था। आंखों में सुर्ख रंग और चेहरे पर आज भी शोखियां बटोरे बावन वर्षीय DIG चाय वाले का असल नाम ओम प्रकाश सैनी है। ओम प्रकाश की कचहरी में अच्छी जान-पहचान है और कचहरी में भी वकील, जज, पेशकार और बाबुओं सहित सभी लोग ओम प्रकाश को पसन्द करते हैं । छब्बीस जनवरी, पंद्रह अगस्त और दो अक्टूबर जैसे विशेष अवसरों पर इनकी ही चाय की चुस्कियां जजों के होठों का सबब बनती हैं। स्वभाव से नरम और फ़ैसलों से सख्त ओम प्रकाश मददगार इंसान के तौर पर जाने जाते हैं । रामपुर कोर्ट में तैनात कई बाबुओं ने अपनी आपबीती मुझे सुनाई और हर किसी के अनुभव संसार में मैंने ओम प्रकाश और उनके मददगार स्वभाव को सदृश पाया।

खुद्दार DIG चाय वाले अपनी दुकान पर

साल 1989 से अपनी दुकान चला रहे ओम प्रकाश या DIG आजकल अपनी इस दुकान पर भोर के चार बजे से लेकर सुबह 10 बजे तक और रात को एक घण्टा- नौ बजे से दस बजे तक ही दुकान में बैठते हैं । बाकी के समय इनके 31 वर्षीय बेटे राजकुमार सैनी अपने दो सहायकों मुकेश (24) और कमल (26) के साथ दुकान पर रहते हैं। दिलचस्प बात है कि DIG से मेरी मुलाकात के पहले जब मैंने राजकुमार से उनके पिता को DIG कहे जाने का राज पूछा तो वो भी मुझे स्निग्ध भाव से आश्चर्य में देखने लगा और बोला, ये तो हमने भी अब तक पता न है जी।

अपनी दुकान पर DIG चाय वाले के बेटे राजकुमार

जाहिर है आपकी तरह मेरी भी कुलबुलाहट अब और भी बढ़ती ही चली जा रही थी। आठवीं तक पढ़े ओम प्रकाश से जब मैं बातचीत करने लगा तो आधे घण्टे से ऊपर गुजरे वो मुझे कुछ भी बताने से इन्कार करते रहे। फिर मेरी ये राज जानने की तलब और बढ़ी । मेरी तलब भांपकर ओम प्रकाश अब कुछ-कुछ फुसफुसाने लग गये थे। उन्होंने मुझसे कहा कि उनसे ये बात हर कोई पूछता है लेकिन वो टाल देते हैं। वो आगे कहते हैं कि कभी-कभी एसपी साहेब भी हमसे पूछते रहते हैं कि भई DIG तू तो बड़ा है हमसे, भई हम तो एसपी रह गए और तुम तो DIG हो गए ! आखिर बता तो राज क्या है ?”

मेरे और ओम प्रकाश के बीच घण्टों बात चली, लेकिन स्वाभिमान के धनी DIG ने अब तक एक बक्कुर भी न डाला। मेरे पुनश्च अनुरोध पर वो एक गहरी सोच में डूबते चले जाते और जब उससे बाहर निकलकर आते तो बस यही कह पाते कि पत्रकार साहब छोड़िए । वो पुरानी बातें हैं, उनको जानकर आप क्या करेंगे? मैं वो सब आपको बता नहीं सकता क्योंकि उससे किसी एक समुदाय की इज्जत पर आंच आ जाएगी। मैंने फिर भी अपनी जिज्ञासा से कोई समझौता नहीं किया, उल्टे वो और बलवती होती गयी।

मैंने अपना प्रयास जारी रखा और फिर अंततः उन्होंने मुझे लगभग 35-40 साल पहले की एक लम्बी घटना बतायी जिसकी वजह से रामपुर कोर्ट में हफ़्तों हड़ताल रही थी। दो पक्षों के वकील आमने-सामने थे और ओम प्रकाश को लगातार शाबाशियां मिल रही थीं, उन्हीं शाबाशियों में एक शाबाशी थी सिविल लाइन्स कोतवाली (तब थाना) में तैनात तत्कालीन कोई वर्मा जी (प्रथम नाम DIG की स्मृति में नहीं है) नाम के दरोगा की। उन्होंने ही पहली बार ओम प्रकाश को DIG कहा था और तभी से ओम प्रकाश बदलकर ओम प्रकाश सैनी से डीआईजी हो गए। आज लोग इन्हें ओम प्रकाश के नाम से न के बराबर जानते हैं बल्कि ये DIG के नाम से ही मशहूर हैं।

देर शाम DIG चाय वाले की दुकान पर अलाव तापते रामपुर कोर्ट के कर्मचारी

वास्तव में सालों पुरानी वो जो घटना थी उसे मैं कुछ पत्रकारीय उसूलों और उससे भी अधिक ओम प्रकाश द्वारा मेरे अनुनय पर ऑफ द रिकॉर्ड कही गयी बातों के कारण सार्वजनिक नहीं कर सकता हूं। हालांकि इसे सार्वजनिक करने के लिए मेरे बार-बार जोर देने पर अब उल्टे वो मुझसे कहते कि आप दिल्ली जाकर अपने दोस्तों से कहिएगा कि रामपुर के DIG चाय वाले के यहां दस रुपये कि स्पेशल चाय और छः रुपये की सादी दूध की चाय मिलती है, एक बार मित्रों को यहां की चाय पिला जाइए…। DIG की बातें सुनकर हम दोनों ने जोर के ठहाके लगाए।

मैं सन्तुष्ट और स्वयं DIG इन ठहाकों के साथ अपने अतीत से निकलकर अभी तक के सफर को तय कर फिर से वापस मेरे सामने अविचल भाव में आ बैठे थे । जनवरी की रात के साढ़े दस हो चुके थे। DIG अपने कम्बल और रजाई को दुरुस्त करने लग गये। चाय की झोपड़ी के बाहर झड़ती ओस की बूंदे भी दबे मन मुझे शुभ रात्रि बोल रही थीं। उमेश मेरे पास से जाकर वापस पन्द्रह मिनट से आकर मुझे डिनर के लिए बुलाने को खड़ा था । DIG उर्फ ओम प्रकाश सैनी को राम-राम कहकर मैं मन में पूर्णता समेटे उमेश के कमरे में परोसी अपनी डिनर की थाली के लिए तेजी से कदम बढ़ाए चला जा रहा था।


ये ब्यौरा हमें लिख भेजा था अमित राजपूत ने। अमित देसी मिजाज के सख्त इंसान हैं। सख्ती से हमारा मतलब, इनका अपनी तरह के इलाहाबादी अभिजात्यपना से है। इनको इलाहाबाद से बहुत प्रेम है। इनकी फेसबुक प्रोफाइल इलाहाबाद विश्वविद्यालय की फोटुओं से भरी रहती हैं।


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