मंडी जिले में है एक गुप्त गुफा जहां हर कोई जाने से डरता है

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हिमाचल प्रदेश का मंडी जिला। जब मैंने मनाली से दिल्ली लौटते वक्त मंडी जाने का फैसला किया तो वहां के लोकलाइट्स बोलने लगे, ‘क्या मैडम वहां जाकर क्या करोगे। कुछ भी तो नहीं है वहां। आप यहां से आगे रोहतांग जाओ, सोलांग घाटी जाओ फिर यहीं से डायरेक्ट दिल्ली चले जाना।’

लेकिन मैंने मन बना लिया था कि मंडी तो जाना ही है। लग रहा था वहां कुछ तो ऐसा है जो बुला रहा है। सात दिन की लगातार यात्रा से काफी थक चुकी थी इसलिए अलसाते हुए शाम के चार बजे मंडी की बस पकड़ी। मंडी पहुंचते-पहुंचते रात हो गई।

सफर के साथी

एक ढाबे पर खाने बैठी तो उत्सुकतावश ढाबे वाले भैया से पूछा कि यहां क्या-क्या है घूमने को। मुझे लगा था कि ये तो यहीं के हैं कुछ तो अच्छा बताएंगे ही। लेकिन उन्होंने भी मुंह बिचका दिया कि यहां क्या है घूमने को, एक रेवाल्सर झील है वहां चले जाना, गुरुद्वारा भी जा सकते हैं। मैंने कहा अजीब लोग हैं यार। खैर मैं खा-पीकर ठहरने के लिए कमरा देखने लगी तो पता चला कि बगल में ही पंचायती भवन है। सस्ते और अच्छे कमरे की उलझन भी खत्म हो गई। आपको बता दूं कि आज जब भी हिमाचल प्रदेश जाएं और आपको मेरी तरह मंहगे होटल में रुकने का कोई शौक न हो तो हर जिले के बस स्टैंड के पास ही एक पंचायती भवन होता है, वहां ठहर सकते हैं। कई जगह बेड सिस्टम भी होता है लेकिन मंडी में मुझे मिल गया कमरा। मस्त सा कमरा। मात्र 500 रुपए में, एसी, सोफा,टीवी और गीजर भी। खैर निश्चिंत होकर सो गए, जब सुबह आराम से उठे तो रेवाल्सर के लिए बस पकड़ ली।

बादल भी चल रहे थे हमारे साथ

रेवाल्सर के रास्ते में मैंने लोगों से पूछा कि कोई गुफा भी है क्या आगे। तो बहुत से लोगों ने बताया कि कोई नैना मंदिर की गुफा है। मैंने सोचा, हां ये अच्छा है यहीं चलते हैं। देवी के दर्शन भी हो जाएंगे और पहाड़ी गुफा भी दिख जाएगी। रेवाल्सर से नैना देवी की बस पकड़ी। ओफ्फो क्या रास्ता था। बिल्कुल ही सीधी चढ़ाई। अच्छे खासे इंसान का सिर चकरा जाए। हरे-हरे पहाड़ो और नील आकाश के साथ चलते चलते हम नैना माता के मंदिर पहुंच गए। काफी शांत मंदिर है। आसपास सुरम्य वातावरण है। वहां दर्शन किया, प्रसाद पाया। लेकिन पहाड़ी गुफा का जो चित्र दिमाग में बना था वैसा कुछ नहीं मिला। वो जो बस हमें लेकर यहां आई थी वही बस वापस लेकर जाने वाली थी। लेकिन मुझे वापस नहीं जाना था। मुझे वो गुफा ढूंढनी थी जिसके बारे में मैंने कहीं से सुन रखा था। जगह तो यही थी लेकिन वो गुफा कहां थी। बस के ड्राइवर से पूछा तो उन्होंने बताया कि यहां से थोड़ी ही दूर पर नीचे एक गुफा है बौद्धों की, शायद आप उसी की बात कर रही हैं। हम आपको उधर के रास्ते पर छोड़ देंगे। आगे आपको पैदल ही जाना होगा।

जब पहुंचे गुफा जाने वाले रास्ते पर

बस ने एक रास्ते पर उतार दिया। वो जगह बौद्ध धर्म के झंडों से पटी पड़ी थी। जिधर देखो हरे नीले पीले लाल झंडे। अगर उन रंगीन झंडों पर शायद पालि भाषा में कुछ कुछ लिखा नहीं होता तो ऐसा लग रहा था कि हम किसी एलजीबीटी परेड में आ गए हैं।

वो जगह इतनी खूबसूरत थी कि क्या बताएं। वहां के मौसम का मिजाज ऐसा था कि एक अलग सी ही मदहोशी तारी हो रही थी। लग रहा था कि यहीं एक घर बसा लें। मैंने कैमरा निकालकर फोटो खींचना शुरू कर दी। फिर याद आया कि वो गुफा ढूंढनी है। वो जगह एकदम सूनसान थी। किसी इंसान का तो छोड़ो किसी जानवर का भी नामोनिशान नहीं था। कुछ हिंदी या अंग्रेजी में लिखा लैंडमार्क भी नहीं था। नीचे को जाती संकरी सी सीढ़ियां थी। कदम अपने आप उधर बढ़ने लगे। डर तो नहीं लग रहा था लेकिन इस रोमांच का साथ देने के लिए वो रंगीन झंडे हर कदम पर मौजूद थे। फिर अचानक से उन्हीं सीढ़ियों पर दो इंसान देखे। आह क्या संतोष भरी फीलिंग थी वो। इंसान वाकई सामाजिक प्राणी है। लेकिन वो बौद्ध थे। अलग ही भाषा में बात कर रहे थे। मैंने उनकी फोटो खींचनी चाही तो उन्होंने छड़ी दिखा दी। मैं सॉरी बोलकर आगे बढ़ गई।

वो प्यारे लोग जिनकी हमने फोटो खींचने की कोशिश की थी.

सीढ़िया जहां ले जा रही थीं, वहीं आगे बढ़ते जा रहे थे। फिर एक जगह ऐसी आई जहां झंडों और पत्थरों के अलावा कुछ दिख ही नहीं रहा था। एक कुछ गुफानुमा चीज भी दिखी लेकिन उसका कोई भी दरवाजा नहीं था। वहां हवन जैसा कुछ हुआ था एक-दो दिन पहले। क्योंकि एक पात्र में राख थी। उस गुफानुमा चीज पर अंजान भाषा में बड़ा सा कुछ लिखा था। हवाएं हिलोरें मार रही थीं। झंडे आपस में उलझ कर एक अजीब सा शोर पैदा कर रहे थे। दांई तरफ एक कच्चा रास्ता जा रहा था जिसमें जगह जगह पर किसी जानवर का मल पड़ा था। तो लगा कि हो न हो इधऱ कोई तो होगा। उस रास्ते के अंतिम छोर पर एक कुटिया जैसा घर दिखा। मुहाने पर एक बहुत ही बूढ़ी महिला बैठीं थीं। उनसे पूछा कि गुफा कहां है तो उन्हें मेरी बात समझ ही नहीं आई। बार बार गुफा गुफा बोला तो थोड़ा समझ आया उन्हें। उन्होंने और नीचे जाने का इशारा किया।

हम जाएं तो जाए कहां

वापस उसी रास्ते पर लौटकर जब नीचे की ओर देखा तो एक और संकरी सीढ़ी दिखी जो घुमावदार रास्ते पर नीचे की ओर ले जा रही थी। बढ़ते गए, उतरते गए। खुला आसमान हौसला आफजाई कर रहा था। दोबारा बोलूंगी, ऐसा दिलकश वातावरण था वहां का कि मन कर रहा था खो ही जाएं इसी में। ढेर सारी सीढ़ियां उतरने के बाद पहला लैंडमार्क दिखा। एक पत्थर पर एरो का निशान था। उस निशान की दिशा में आगे बढ़े तो एक प्यारा सा बरामदा दिखा। उस बरामदे से सटे कमरे में सैकड़ों दीपक रखे थे पीतल के। उसके बगल एक और कमरा था जहां एक दो बौद्ध थे। हमने उनसे पूछा कि गुफा यहीं हैं। तो उन्होंने दाएं देखने का इशारा किया। वोहा। तो क्या हम गुफा में पहुंच गए थे। लेकिन वहां तो कोई गुफा नजर नहीं आ रही थी। एक और कमरा था। अंदर घुसे तो पता चला कि उस गुफा को टूटने से बचाने के लिए कमरे की छत का सहारा दिया गया है। असली गुफा तो अब शुरू होती है, सीक्रेट गुफा।

गुफा के पास लगा बुद्धिस्ट सिलेंडर

गुफा की छत पर ढेर सारे सिक्के चिपकाए गए थे, दरारों में ठूंसे गए थे। अरे ये तो अपने मंदिर टाइप की चीजें यहां भी। गुफा में और अंदर जाते उससे पहले कई सारी मूर्तियां रखी थीं। छोटी-बड़ी कई साइज की। दलाई लामा की भी एक तस्वीर थी। उन झंडों के रंग की तरह यहां गुफा के अंदर ढेर सारे रंगीन बल्ब लगे थे। ये थोड़ा अजीब नजारा देखकर मैं गुफा में और अंदर की ओर बढ़ गई। अंदर संकरा रास्ता था। गुफा की दीवारों पर खूब सारे लिखे हुए थे। नहीं कोई ऐतिहासिक नाम नहीं, बल्कि स्केचपेन से आगुंतकों ने अपने नाम गोद रखे थे। मुझे आश्चर्य के साथ बहुत दुख हुआ कि इस सुनसान जगह पर भी, जहां लोग कम आते हैं वहां पर भी दीवारें नाम से गुदी हुई हैं। गुफा में एक बोर्ड भी लगा है, जिसपर साफ साफ लिखा है कि गुफा पर कुछ भी न लिखें। लेकिन फिर भी। हमें एक समाज के तौर पर शर्म आनी चाहिए।

उस संकरे से रास्ते के आगे एक बड़ा सा स्पेस था, उस जगह पर विशालकाय मूर्ति थी। होगी यही कोई तकरीबन 17 फुट उंची, 4 फुट चौड़ी। मेरी आंखे एकदम विस्मय से भर गई। आखिर इस संकरी सी गुफा में इतनी ऊंची मूर्ति लाई कैसे गई होगी। फिर लगा हो न हो ये गुफा के अंदर ही बनाई गई। बौद्ध धर्म की जितनी भी मूर्तियां अब तक मैंने देखी थीं, वो उन सबसे बिल्कुल ही अलग थी। मूर्ति के बड़ी-बड़ी आंखें थीं। शांत और कोमल आंखें नहीं बल्कि सजग और शायद क्रोधित आंखें। सर पर एक तरह का मुकुट लगा था। अच्छे से कपड़े से सुसज्जित मूर्ति गफलत में डाल रही थी कि क्या वाकई ये बौद्ध धर्म की मूर्ति है। चूंकि वहां कुछ भी लिखा नहीं था इस मूर्ति के बारे में न ही उस गुफा के संरक्षकों को हमारी भाषा आती थी। तो मालूम नहीं चल पाया कि वो मूर्ति आखिर थी किसकी। मैंने गेस मारा कि हो सकता है ये बुद्ध के किसी और राजसी अवतार की हो जिसके बारे में जानकारी न हो।

वो विशालकाय मूर्ति

उस जगह से आगे बढ़े तो एक और संकरा और अंधेरा रास्ता था। उसको पार करके पहुंचे तो वहां किसी महिला की सुंदर सी मूर्ति थी। 6 पात्रों में लबालब पानी भरा रखा था। एक बात ध्यान देने वाली और थी, हर मूर्ति के सामने वो रंगीन बल्ब लगे थे ढेर सारे। अब ये महिला मूर्ति किसकी हो सकती है। क्या पता।

जब घर आकर मैंने उस गुफा के बारे में ढूंढा तो पता चला कि वो बड़ी सी मूर्ति थी बौद्ध गुरु पद्मसंभव की, जिन्हें आचार्य रिनपोच के नाम से भी जाना जाता है। पद्मसंभव 8वीं सदी के महासिद्ध थे जिन्हें तिब्बत से भेजा गया था ताकि वो बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार कर सकें। और वो महिला मूर्ति थी मंडी के राजकुमारी मंदारवा की। इस गुफा और उन दोनों मूर्तियों के पीछे की कहानी ये है, गुरु पद्मसंभव ने मंदारवा को बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा देनी शुरू कर दी। मंडी का राजा पद्मसंभव की इस शिक्षा और राजकुमारी से उनकी नजदीकियों को देखकर बौखला गया। उसने मंदारवा को जेल में कैद कर दिया और पद्मसंभव को जला डालने का आदेश दिया। पद्मसंभव के लिए बड़ी सी चिता तैयार की गई और उसके अंदर उन्हें बैठाकर आग लगा दी गई। वो आग कई दिनों तक जलती ही रही। लोगों को कुछ समझ नहीं आया तो उन्होंने चिता के अंदर जाकर पद्मसंभव के अवशेष देखने का निर्णय लिया। लेकिन वहां तो नजारा ही कुछ और था। पद्मसंभव एक बड़े से कमल पर बैठकर तपस्यालीन थे, आग उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पायी। बल्कि वहां उनके आस-पास एक झील बन गई थी। राजा को जब ये खबर मिली तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने फौरन मंदारवा को कैद से मुक्त कर दिया और पद्मसंभव के पांव पकड़ लिए। इसके बाद उसने भी पद्मसंभव से दीक्षा लेकर बौद्ध धर्म को अपना लिया।

वहां रखा हवन कुंड

खैर ये तो हुई कहानी। उस रहस्यमयी गुफा से बाहर निकल कर जब बाहर के नजारे पर नजर गई तो वक्त ठहर सा गया। अरे हां नैना देवी से उतरते वक्त पैर में मोच आ गई थी। लेकिन इस गुफा के तिलिस्म में वो दर्द याद ही नहीं रहा। देखो न अब भी लिखते वक्त गुफा तक घूम लेने के बाद ही वो दर्द आया। वो कहते हैं न जब आपको कोई अपने मखमली आगोश में ले ले तो एक-एक करके आपके जिस्मोदिमाग का हर दर्द बाहर आने लगता है और धीरे-धीरे वो दर्द भाप बनकर उड़ने लग जाता है। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ, प्रकृति ने मुझे बांहों में भर लिया था। वो स्निग्ध धूप मुझे सहला रही थी, मंद गति से चल रही हवाएं मेरे बाल फेर रहीं थीं, सामने दिख रही एक छोटी सी झील और चहुंओर फैली हरियाली मेरी आंखों को चूम रही थीं। मैं डूबती जा रही थी। पैर दुख रहा था। मैं वहीं पैर फैलाकर बैठ गई। सामने एक बिल्ली बैठी थी, प्यारी सी। कौतुक आंखों से मुझे ही देख रही थी। शायद मुझसे दोस्ती करना चाहती थी और जल्द ही हमारी दोस्ती भी हो गई। शीघ्र ही मैं अपना दर्द भूल गई और ख्यालों में डूब गई।

वो देखो मेरी दोस्त

ख्यालों का सिलसिला तब टूटा जब बादलों के पीछे छिपा सूरज एकदम से बाहर आ गया। मेरी आंखें दिवा स्वप्न से बाहर आ गईं। याद आया कि बस भी पकड़नी है। अगर कभी-कभी आने वाली बस भी निकल गई तो? वैसे इस तो का जवाब और भी सुकून देने वाला था। एक दिन यहीं रुकने का मौका। लेकिन दिमाग दिल्ली वापस जाने को बोल रहा था। क्योंकि वहां सब मेरा इंतजार कर रहे थे। मैं सीढ़ियों पर बलखाते हुए नीचे उतरने लगी। बलखा रही थी क्योंकि मुझ पर एक तरह का नशा चढ़ा हुआ था। नीचे पहुंची तो एक अंकल ने बताया कि बेटा अब तो कोई बस नहीं आएगी। तभी उधर से एक सामानगाड़ी गुजरी। उन्होंने बोला कि इसी पर चढ़ जाओ, यहां गाड़ियां भी कम ही आती हैं। मैं चट से उसपर चढ़ गई। गजब उछल रही थी वो गाड़ी। एक तो पहाड़ी रास्ता उस पर भी वो गाड़ी लुजबुज।

नज़ारे डायरेक्ट फ्रॉम उछलती गाड़ी

ये एक अलग ही अनुभव था, गाड़ी भाग रही है और साथ में हमारे सिर के ऊपर खुला आसमां। किसी ओपन जीप में सफर करने जैसा लग रहा था। बस जीप में आराम से बैठने को मिलता, यहां खड़े-खड़े उछल रहे थे। गाड़ी वाले ने एक्स्ट्रा पैसे लेकर रेवाल्सर के मेन रोड तक छोड़ दिया। वहां से पैदल डग भरते हुए हम बस स्टैंड तक पहुंच गए। बस पकड़कर वापस मंडी बस स्टॉप। फिर वहां से दिल्ली।

सफर से लौटना, सफर के लिए जाने जितना एक्साइटिंग तो नहीं होता लेकिन सुकून भरा जरूर होता है। सुकून जो आपने उन हवाओं से उधार लेकर अपने में भर लिया है। सच में। खुद ट्राय करके देखिएगा।


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