शहर जकड़ता है, हम जी छुड़ाकर पहाड़ों पर भागते हैं

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जब यात्रा शुरू की तो शहर पीछे छूटता गया। शहर घबराया हुआ पीछे से ताक रहा था। मैंने उसकी तरफ देखना सही नही समझा क्योंकि वो बंधन टूट रहे थे जिसकी बदौलत उसने मुझे अपनी गिरफ्त में कर रखा था। धीरे धीरे शहर अपनी रंगीनियों में लुप्त खो सा गया। अब एक नयी काल्पनिक संवेदना रह रह कर झकझोर दे रही थी। मन में कल्पना के बीज पल्लवित हो रहे थे। कभी वो मुझे नार्निया के काल्पनिक जंगलों की याद दिलाते तो कभी मैं खुद को पापा के साथ ऋषिकेश में गंगा किनारे उस पहाड़ को ताकते हुए पाता जहां मैं बचपन में गया था। पहाड़, नदी ,जंगल, झरनों से बचपन से जितना इश्क रहा उतना ही उनसे दूर था। शहर की रंगीन चादर की सिलवटों में मैं सिमट सा गया था। विवशताओं में खुद को फंसा हुआ पाकर खुद को कभी वहां से निकाल नही पाया था। लेकिन मैंने उस दिन खुद को उन सिलवटों से आजाद पाया था।

दिल्ली से ऋषिकेश तक आने के बाद ऋषिकेश में 1 घंटे बस का हाल्ट था। रात के अंधेरे में डूबी ऋषिकेश की पहाड़ियों पर बनी इमारतों की लाइटें जुगनू जैसे दिखाई पड़ रही थी। पास के ढाबे में पहाड़ी लोक संगीत बज रहा था। शरीर की थकान को पहाड़ से आती मंद हवा दूर कर रही थी और मन की थकान को वह संगीत। ऋषिकेश के आगे का सफर कैसा होगा मुझे कोई अंदाजा नहीं था। बस चलने को हुई और पहाड़ी चढ़ाई पर बस तेज रफ्तार से भागने लगी। खतरनाक मोड़ों पर ड्राईवर बस को खिलौने की तरह मोड़ देता था। ठीक वैसे ही जैसे बचपन में मैं अपनी खिलौने वाली कार घर में दौड़ाता था। किसी तीव्र मोड़ पे बस जब मुड़ती तो सैकड़ों फीट गहरी खाई के दर्शन हो जाते। मुंह से निकलता, ‘लइ गवा।’

धीरे धीरे सुबह होने लगी थी। जो पहाड़ अंधेरे की चादर ओढ़े हुआ था वह अब थोड़ी सी चादर हटा के झांक रहा था। पहाड़ों से जगह जगह से दूधिया मंदाकिनी बह रही थी । मंदाकिनी और हरे भरे वृक्ष पहाड़ के सौंदर्य को बढ़ा रहे थे। रास्ते से सटे हुए पहाड़ जैसे लगता की अभी कूद पड़ेंगे। जैसे पिंजड़े में बंद झबरैले शेर को चिढ़ाने पर वह बौखला कर डराता है। लेकिन पहाड़ डराने के लिए नहीं कूदते थे। मंदाकिनी तो अपना हाहाकार शांत करने को राजी ही नही थी। किसी से जा मिलने की उत्कण्ठा के साथ वह बहती जा रही थी। मार्ग की बाधाएं उसे स्वीकार नही थी। लेकिन वो शोर भी शांतिप्रद था। जैसे उसका शोर मन के किसी कोने में जाकर असीम शान्ति दे जाता था। वास्तव में वह शोर था ही नही। वह उसके तेज, माधुर्य, आत्मविश्वास का ध्वन्यात्मक पुंज था।

ऋषिकेश से गुप्तकाशी का छह घंटे का पहाड़ी सफर काफी थकान भी दे गया था | लेकिन उस थकान में आनंद की भी कुछ बूंदें घुली हुई थीं। अभी वहांसे पैतीस किलोमीटर का रास्ता और तय करना था। रास्ता खराब होने के कारण वहां बस नही जा सकती थी। हम गौरीकुंड तक जीप से गए। रास्ते में छोटे-छोटे झरने मिलते जिसका पानी जीप के ऊपर गिरता था। गौरीकुंड पहुंचने के बाद हमने होटल में रात भर आराम किया और अगले दिन सोलह किलोमीटर की चढ़ाई पर जाना तय हुआ। हम पैदल ही चढ़ाई करने वाले थे। शाम हो गयी थी मैं होटल की बालकनी में खड़ा था, अंधेरा हो रहा था, स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में बरसात की बूंदें चमकते सोने जैसी लग रही थी।

पहाड़, मनुष्य सभी खामोशी की चादर ओढ़े अँधेरे में छिप गए थे। वातावरण में सिर्फ एक आवाज़ थी जो पहले से अधिक जान पड़ रही थी, मंदाकिनी अब भी अपने स्वर बिखेर रही थी। रात भर की तमाम मानसिक उठा पटक के बाद पैदल यात्रा के दौरान जब काल्पनिक संवेदना अपने साक्षात रूप में उपस्थित हुई तो मै अवाक सा उसे ताकता रहा और एक नयी काल्पनिक संवेदना मेरी रगों में दौड़ उठी। मै और प्रकृति एक दूसरे को ताकते रहे। मुझे याद है उन पहाड़ों को मैं घंटो अनिमेष देख सकता था।

पहाड़ों के वृक्षों से बनी वो भालू, वनमानुष, बड़ी दाढ़ियों वाला योगी आदि आकृतियां मुझे घूर रही थी। मै भी उन्हें देर तक देखता रहा। मेरे हवाबाज मन ने आवाज लगाई, अरे सुनो! कहीं ये आकृतिया ठंड के दिनों में जिंदा तो नहीं हो जाती जब यहां कोई नहीं होता या कहीं ये कोई चकमा तो नहीं। वो भालू मुझे ही घूरे जा रहा था, मंदाकिनी अपने हाहाकार के साथ मुझे देख हंस रही थी। अचानक पीछे से हुफ् हुफ् टन टन की आवाज आई कोई घोड़ी पे बैठा पीछे से आ रहा था। उसका मुंह पिचका हुआ था। उसने शायद मुझे प्रकृति से बात करते और मंदाकिनी की बूंदों को चूमते देख लिया था।


केदार घाटी पहुंचने पर ऑक्सीजन कम होने लगी थी। हम थक के चूर हो गए थे। ठंड हमारी नसों में दौड़ रही थी। लेकिन केदारघाटी का जो आकर्षण था उसने हमारी हिम्मत को टूटने नहीं दिया। केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे बर्फ के ग्लेशियर्स की पहाड़ियों का सौंदर्य देखते ही बनता था। चारो तरफ से पहाड़ियों से घिरा केदारनाथ मंदिर एक पवित्र ऊर्जा पुंज सा दिख रहा था। किसी लाउड स्पीकर से आती शिव स्तुति की आवाज उस वक्त के वातावरण को और सघन बना रही थी। इतना सघन की ह्रदय पर कुछ भारी सा महसूस हो रहा था।

वापस लौटते समय भी पहाड़ों पर मैं उन भालुओं और बड़ी दाढ़ी वाला योगी और वनमानुषों को खोज रहा था। इस बार कई अन्य भी मिले घोड़े, शेर, उल्लू आदि। जैसे-जैसे पहाड़ दूर होते जा रहा थे मन कर रहा था एक बार और देख लेता। काश मेरी बाहें इतनी विशाल होती की इनको मै अपने आगोश में कर लेता। मेरे लिए घुमक्कड़ी के मायने पहले कुछ और थे परंतु अब कुछ और हैं। घुमक्कड़ी मतलब मेरे अंदर के उस ‘मैं’ की खोज जिससे मैं कभी रू-ब-रू नहीं हो पाया। क्योंकि इस प्रकृति से साक्षात्कार के वक्त मैं वो पुराना वाला इंसान नहीं था।

जितनी बातें मैंने पहाड़ों, नदियों से की उतनी बात मैं इंसानों से भी नहीं करता। इनके साथ बिताया छोटा सा पल भी सदियों जितना पुराना लगा था और मैं जानता हूं वह ‘मैं’ ही मेरा मूल है। वापस ऋषिकेश पहुँचने के बाद आखिरी बार पहाड़ों से मैंने कहा था, ‘पहाड़ ! तुमने सबको प्रश्रय दिया है। जल, जीव, जंतु सभी तुम्हारी गोद में खेले हैं। तुम इस धरा के पुत्र हो। मैं जानता हूं हम इंसान तुम्हारी चमड़ियां उधेड़ेंगे फिर भी तुम प्रश्रय दोगे।’


मुझे याद है ऋषिकेष से दिल्ली आते वक़्त आखिरी समय तक पहाड़ और मैं एक दूसरे को झांक रहे थे।
उसके बाद वह लुप्त हो गया और जो लुप्त हो गया था फिर से साक्षात हो गया। वह वही शहर था जिसकी सिलवटों में मैं जकड़ा हुआ था। फ्लाईओवर, क्रेन, धूल, कर्कश ध्वनि, धुआं ।

जाम में बस रुकी , फ्लाईओवर के नीचे एक टेंट में एक स्त्री अपने बच्चों के साथ सोई हुई थी। बच्चे रो रहे थे। एक अन्य स्त्री आई उसने कहा कुछ दे दो बाबू। मेरे मुंह से निकला, क्या दे सकता हूं, खुशी?


ये प्यारा सा यात्रा विवरण हमें लिख भेजा है व्योमकांत मिश्र ने। व्योम को हिंदी भाषा से बेहद लगाव है। बड़े शहरों की गलघोटू भीड़ से बड़ा डर लगता है इनको तो शांति की तलाश में भटकने लगते हैं। पहाड़ों की निर्मल हवा में इनको असली प्राणवायु मिलती है। ये चाहते हैं कि वहीं बस जाएं लेकिन तमाम सांसारिकता पांव रोक लेती है। व्योम को विश्वास है कि एक न एक दिन वो जरूर पर्वतमालाओं पर बैठकर हिंदी में साहित्य रचना करेंगे। 


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