बस्तर 7: दंतेवाड़ा के गांवों में दस-दस कदम की दूरी पर रोड उखाड़ दी गई हैं

(दंतेवाड़ा में पहुंचने और कटेकल्याण में इससे पहले हुई घटनाओं का ब्यौरा यहां पढ़ें)

कटेकल्याण के इस स्कूल और वहां के प्रिंसिपल से मिलकर थोड़ा आश्वस्त हो आगे बढ़ती हूं। अनुरोध करने पर स्कूल के ही एक टीचर, जो उत्तर प्रदेश से थे। वे भी गांव तक साथ चलते हैं। एक स्थानीय बच्चा भी हमारे साथ हो लिया। टीचर ने कहा कि अंदर कोई पूछेगा तो आपको अपना परिचय स्कूल में आई एक नई टीचर के रूप में देना। मैंने हामी भर दी। कुछ किलोमीटर चलने और एक-दो टूटे छोटे पुलों को पार करने के बाद हम एक गांव में थे।

इधर सड़कें बनी नहीं कि उखाड़ दी जाती हैं

हम मुश्किल से दस कदम ही चले होगें। वो गई-गुजरी सड़क भी बीच से तोड़ डाली गई थी। उसे वहां से जानबूझकर तोड़ा गया था ताकि कोई भी चारपहिया गाड़ी सीधे गांव में न पहुंच पाए। ऐसा हमें साथ चल रहे स्थानीय लड़के ने बताया। अभी दिमाग में इसी बात को हजम करने की जद्दोजहद चल रही ही थी। तभी एक और जगह से सड़क टूटी हुई दिखाई दी।

ये एक छोटा सा नाला था। पैदल भी चलना मुश्किल हो रहा था। ये परचेली गांव था। गांव के दूसरे छोर तक पहुंचने में ऐसे ही पांच से भी ज्यादा जगहों पर सड़कें तोड़ी गई थी। गांव के चारों तरफ बस्तर की चिर-परिचित हरियाली ही हरियाली थी। सड़क पर बैठकर आदिवासी औरतें धान और जड़ी-बूटी जैसी कुछ चीजें सुखा रही थीं। उनमें से ज्यादातर ने कपड़े के नाम पर एक लुंगी और चुन्नी पहने हुआ था।

गड्ढे इतने गहरे हैं कि किसी भी गाड़ी का चक्का फंस गया तो गाड़ी पलटनी तय है

उन औरतों में से हिंदी शायद ही किसी को आती थी। टीचर और स्थानीय लड़के के साथ होने की वजह से ज्यादातर लोग सच में मुझे एक शिक्षिका समझ रहे थे। रास्ते में मिल रहे बच्चों ने मुझे नमस्ते मैडम बोला। ये बच्चे भी डीएवी स्कूल में पढ़ने जाते होंगे। एक बच्चे ने रुककर कच्चे बेर और अमरूद भी दिए।

चलते-चलते हम परचेली गांव के दूसरे छोर पर आ गए थे। सामने नदी की एक छोटी-सी धार बह रही थी। तकरीबन दस फुट चौड़ा और उससे भी ज्यादा गहरा गड्ढा खोद दिया गया था। परचेली और उसके बाद वाले गांवों का एक-दूसरे से संपर्क पूरी तरह से तोड़ देने की साजिश थी ये।

वो जो बाएं तरफ पानी दिख रहा, वही नदी है, पुल पूरी तरह से क्षतिग्रस्त है. फोटो के एंगल इतने बेतरतीब इसलिए हैं कि हमें आगाह किया गया था कि सामने से दिखाकर तस्वीरें मत उतारिएगा.

मैं ये गड्ढा पार करके आगे जाना चाह रही थी। लेकिन एक स्वर में सबने रोक दिया। ये मेरे लिए खतरा तो था ही। साथ ही स्थानीय लोगों के लिए मुसीबतें बढ़ाने वाला था। मैं एक तरह की बेबसी में वहीं खड़ी रही। अचानक मुझे एक युवा लड़की दिखाई पड़ती है। उसने सलवार कमीज पहन रखी थी। उसके चेहरे पर एक अलग ही आत्मविश्वास नजर आ रहा था।

उसका नाम गंगा कवासी था। वो उस इलाके में स्वास्थ्य विभाग की तरफ से नियुक्त थी। उसके अंडर में मितानिन काम करती हैं। मितानिन यहां पर आशा बहुओं को पुकारा जाता है। उसने बताया कि जब इमरजेंसी डिलीवरी या ऐसा कोई केस आता है तो 108 या 102 पर कॉल करते हैं। इसके बाद इस टूटी-फूटी सड़क पर जितनी दूर तक एंबुलेंस आ पाती है, आती है। वहां तक गांव के लोग मरीज को यहां तक लाते हैं। कई बार जच्चा-बच्चा की मौत रास्ते में ही हो जाती है।

गंगा को वापस गांव के अंदर जाना था और हमें भी वहां से लौटना था। उसके साथ गांव के हालात पर बातें करते हुए हम चलने लगे। एक गली में आकर वो एक घर में दवाई देने के लिए चली गई और हम आगे बढ़ गए।

(यात्रा जारी है, आगे का ब्यौरा यहां पढ़ें)


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