इस जगह पर आकर जानिए, मरने के बाद बुद्ध के शरीर का क्या हुआ था?

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सांची भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन जिले में बेतवा नदी के तट पर स्थित एक छोटी सी जगह है। यह भोपाल से 46 किलोमीटर पूर्वोत्तर में, बेसनगर और विदिशा से 10 किलोमीटर की दूरी पर मध्य प्रदेश के मध्य भाग में स्थित है। यहां कई बौद्ध स्मारक हैं, जो तीसरी शताब्दी से बारहवीं शताब्दी के बीच के काल के हैं। रायसेन जिले में एक और वैश्विक महत्व का स्थल भीमबेटका भी है। बौद्ध धर्म में सांची ऐतिहासिक महत्व का स्थल है, जबकि बुद्ध ने कभी भी सांची की यात्रा नहीं की थी।

सांची का निर्माण बौद्ध अध्ययन व शिक्षा केंद्र के रूप में किया गया था। सारनाथ से मिले अशोक स्तम्भ, जिस पर चार सिंह बने हुए हैं, के जैसा ही एक अशोक स्तम्भ सांची से भी मिला है। इन स्तंभों का निर्माण ग्रीको-बौद्ध शैली में किया गया था। सांची का स्तूप बुद्ध के ‘महापरिनिर्वाण’ का प्रतीक है।

सांची का बौद्ध विहार यहां मौजूद महान स्तूप के लिये प्रसिद्ध है। सांची स्तूप के निर्माण की जिम्मेदारी अशोक महान की पत्नी देवी को सौंपी गयी थी। सांची का महान स्तूप भारत की सबसे प्राचीन संरचनाओ में से एक है। इसका नाभिक अर्धगोल ईट संरचना में बौद्ध के अवशेषों के आधार पर बनाया गया है। इसे छत्र का ताज भी पहनाया गया है, यह छत्र बुद्ध की उच्चता को दर्शाता है। वहां रत्नों से जड़ा एक पिलर भी स्थापित किया गया है। पिलर के ऊपरी भाग को चंदवा में रखा गया है। यह पिलर अशोक का ही शिलालेख था और गुप्त के समय में शंख लिपि से बनने वाले आभूषण भी इसमें शामिल है।

स्तूप दो

सांची के स्तूप

सांची छोटे-बड़े अनेकों स्तूप है,जिनमें स्तूप संख्या 2-सबसे बड़ा है। चारों ओर की हरियाली अदभुत है। इस स्तूप को घेरे हुए कई तोरणद्वार भी बने हैं। चौदहवीं सदी से लेकर वर्ष 1818 में जनरल टेलर द्वारा पुन: खोजे जाने तक सांची सामान्य जन की जानकारी से दूर बना रहा। सांची के स्तूप का व्यास 36.5 मीटर और ऊंचाई लगभग 21.64 मीटर है। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाने के बाद सबसे पहले जिस स्तूप का निर्माण कराया वह सांची का स्तूप ही था।

स्तूप संख्या-1 के पास कई लघु स्तुप भी हैं। उन्हीं के समीप एक गुप्त कालीन पाषाण स्तंभ भी है। यह प्रेम, शांति, विश्वास और साहस के प्रतीक हैं। सांची का महान मुख्य स्तूप, सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी, ई.पू. में बनवाया था। इसके केन्द्र में एक अर्धगोलाकार ईंट निर्मित ढांचा था, जिसमें भगवान बुद्ध के कुछ अवशेष रखे थे। इसके शिखर पर स्मारक को दिये गये ऊंचे सम्मान का प्रतीक रूपी एक छत्र था। सांची के स्तूप दूर से देखने में भले मामूली अर्द्धगोलाकार संरचनाएं लगती हैं लेकिन इसकी वैभव, विशिष्टता व बारीकियों का पता सांची आकर देखने पर ही लगता है। इसीलिए देश-दुनिया से बडी संख्या में बौद्ध मतावलंबी, पर्यटक, शोधार्थी, अध्येता इस बेमिसाल संरचना को देखने चले आते हैं।सांची के स्तूपों का निर्माण कई कालखंडों में हुआ जिसे ईसा पूर्व तीसरी सदी से बारहवीं सदी के मध्य में माना गया है। ईसा पूर्व 483 में जब गौतम बुद्ध ने देह त्याग किया तो उनके शरीर के अवशेषों पर अधिकार के लिए उनके अनुयायी राजा आपस में लड़ने-झगड़ने लगे। अंत में एक बौद्ध संत ने समझा-बुझाकर उनके शरीर के अवशेषों के हिस्सों को उनमें वितरित कर समाधान किया। इन्हें लेकर आरंभ में आठ स्तूपों का निर्माण हुआ और इस प्रकार गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार इन स्तूपों को प्रतीक मानकर होने लगा। यह स्तूप एक ऊंची पहाड़ी पर निर्मित है। इसके चारों ओर सुंदर परिक्रमापथ है। बालू-पत्थर के बने चार तोरण स्तूप के चतुर्दिक हैं।

मूर्तिकारी में प्राचीन भारतीय जीवन के सभी रूपों का संक्षिप्त विवरण किया गया है। मनुष्यों के अतिरिक्त पशु-पक्षी तथा पेड़-पौधों के जीवंत चित्र इस कला की मुख्य विशेषता हैं। सरलता, सामान्य और सौंदर्य की उद्भभावना ही सांची की मूर्तिकला की प्रेरणात्मक शक्ति है।

छोटा तोरण द्वार

बौद्ध मठ

सांची के स्तूपों के समीप एक बौद्ध मठ के अवशेष हैं जहां बौद्ध भिक्षुओं के आवास थे। यही पर पत्थर का वह विशाल कटोरा है जिससे भिक्षुओं में अन्न बांटा जाता था। इसके अलावा यहां पर अन्य स्तूपों का निर्माण कराया गया हैं। सांची में इन स्तूपों का कायाकल्प का काम लंबे समय तक चला। कुषाण सातवाहन व गुप्तकाल तक बौद्ध धर्म फलता फूलता रहा किन्तु इनके विनाश के बाद राजकीय कृपादृष्टि समाप्त होने से बौद्ध धर्म का अवसान होने लगा। लेकिन बाद के शासकों ने बौद्ध स्मारकों व मंदिरों को अपने स्थान पर रहने दिया।

सांची म्यूजियम

सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में 1912 से लेकर 1919 तक सांची के स्तूप की मरम्मत कराई गयी। सर जॉन मार्शल ने 1919 में सांची में पुरातात्विक संग्रहालय की स्थापना की, जिसे बाद में वर्ष 1986 में सांची की पहाड़ी के आधार पर नए संग्रहालय भवन में स्थानांतरित कर दिया गया। 1912 से 1919 के बीच, ढांचे को वर्तमान स्थिति में लाया गया। यह सब जॉन मार्शल की देखरेख में हुआ। आज लगभग पचास स्मारक स्थल सांची के टीले पर ज्ञात हैं, जिनमें तीन स्तूप और कई मंदिर भी हैं। यह स्मारक 1989 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित हुआ है।


सांची के बारे में ये जरूरी बातें हमें लिख भेजी हैं, अब्दुल आलम ने। अब्दुल झांसी में रहते हैं। अभी मध्य प्रदेश घूमने आए हैं। बुंदेलखंडी संस्कृति पर बड़ा नाज है। नजरें बड़ी चौकस रखते हैं। इतिहास में खासी रुचि है। पुरानी इमारतों, लोगों के बारे में जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं। झांसी बुलाते रहते हैं सबको, झांसी की शानदार विरासत के बारे में खूब बताते हैं।


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