असली स्वच्छ भारत तो सिक्किम में है, घूमकर आइए दिल खुश हो जाएगा

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चंद्रभूषण जड़-जंगल-जमीन से जुड़े आदमी हैं। घूमने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। जब भी थोड़ी छुट्टी मिली नहीं कि झोला उठाकर कहीं न कहीं निकल लेते हैं। मौज में रहते हैं, भविष्य की ज्यादा टेंशन नहीं लेते, बस आज में जीते हैं। भूषण अभी हाल ही में सिक्किम से घुमाई करके आए हैं। जब से आए हैं तब से जबान पर दो ही चीज हैं, सिक्किम के लोग और वहां की खूबसूरती। आप भी घूम लीजिए सिक्किम, भूषण के साथ।


जलपाईगुड़ी नाम तो बहुत सुना था मैंने लेकिन अब मैं साक्षात वहां मौजूद था। बात इस साल की मई की है। लोगों की कद- काठी और शक्ल देख कर मैं आश्वस्त हो गया कि मेरी पहाड़ी यात्रा शुरू हो चुकी है। सैकड़ों पहाड़ी युवक-युवतियों का रेला जब ट्रेन से उतरता है तो मुझे बरबस ही दिल्ली याद आ जाती है, जहां इनको चिंकी, नेपाली और न जाने किन किन घिनौने शब्दों से नवाजा जाता है। वहां यह कितने असहज होते होंगे फिर भी बोल नहीं पाते। लेकिन यहां इनको कोई डर नहीं था। बेफिकर और बेखौफ, हंसी-ठिठोली करते हुए ये दूसरी ट्रेन में सवार हो रहे थे।

न्यू जलपाईगुड़ी से मेरी आगे की यात्रा अब ट्रेन से नहीं बल्कि चारपहिया गाड़ियों से होनी थी। न्यू जलपाईगुड़ी और सिलीगुड़ी में ज्यादा कन्फ्यूजियाने की जरूरत नहीं है। सिलीगुड़ी शहर के पास ही है न्यू जलपाईगुड़ी। जैसे बिहार के भभुआ रोड स्टेशन के पास मोहनिया शहर है। यहां से गंगटोक का रास्ता अब खतरों से भरा था। इसकी वजह पहाड़ी सड़कें नहीं बल्की हमारी गाड़ी का ड्राइवर थे। वह अधेड़ उम्र के एक फिल्मी इंसान थे। फिल्मी डायलॉग सुनाने के चक्कर में वे कई बार हैंडल छोड़कर पीछे भी घूम जा रहे थे। ममता, मोदी से लेकर वामियों तक को गरिया रहे थे। उनका दावा था कि अगर वह बंगाल के मुख्यमंत्री बने तो कायाकल्प कर देंगे बंगाल का। उनके सामान्य ज्ञान के असंतुलित डोज से हम फंसा हुआ महसूस कर रहे थे। जैसे-तैसे हम बंगाल के इस पूर्वी इलाके से पूर्व और उत्तर की ओर बढ़ रहे थे वैसे-वैसे हम भारत के 22वें और सबसे खूबसूरत और स्वच्छ राज्यों में से एक सिक्किम के नजदीक जा रहे थे।

मैं सिक्किम की हसीन वादियों में इतना खो गया था कि हमारे बिहारी मूल के बंगाली ड्राइवर साहब की बकवास भी मुझे इरिटेट नहीं कर रही थी। मैं और मेरे तीन साथी दस दिन के लर्निंग जर्नी पर सिक्किम की राजधानी गंगटोक जा रहे थो। उसी में चार दिन निकालकर हमें सिक्किम की वादियों का खूबसूरत नजारों का आनंद भी लेना था। लेकिन सिक्किम घूमने के लिहाज से मई का महीना बेहतर नहीं माना जाता है। खासकर तब जब आप शांतिप्रिय हैं। वैसे यात्रा गाइड करने वाली वेबसाइटें आपको मार्च से जून तक का महीनों में घूमने की सलाह देंगी। छुट्टियों का महीना होने के कारण मैदानी लोगों की भीड़ आपको रोमांचित नहीं बल्कि परेशान करेगी।

इस दौरान छांगु लेक जैसी खूबसूरत जगह भी सूनी-सूनी सी लगती है। बर्फ, जिसकी लालच में हम सिक्किम पहुंचते हैं, वह भी इस दौरान कम ही देखने को मिलती है। नाथुला दर्रे के पास बर्फ का थोड़ा दर्शन मिल जाता है। वहां के स्थानीय मित्रों के मुताबिक मार्च, अप्रैल और अक्टूबर का महीना सबसे हसीन होता है पर्यटकों के लिए क्योंकि तब खूब सारी बर्फ होती है। सिक्किम में घूमने के लिए बेहद ही खूबसूरत जगहे हैं: नाथुला दर्रा, गुरूदोंगमर घाटी, युमतांग घाटी, कंचनजंघा राष्ट्रीय पार्क, छांगु लेक, नामची का बुद्धा पार्क, जुलुक वाइल्ड लाइफ क्षेत्र।

और तो और राजधानी गंगटोक में ही पूरा एक दिन घूमने लायक खूबसूरत जगहे हैं। बौद्ध विहार, जलप्रपात और कई सारे व्यूप्वाइंट। इनके अलावा भी पर्यटन स्थलों की भरमार है छोटे से सिक्किम राज्य में।

हमने जब अपने जरूरी कामों को निपटा कर घूमने की योजना बनाई तो टॉप लिस्ट में नाथुला दर्रा था। यहां बर्फ तो मिलती ही है साथ में चीनी बॉर्डर का भी नजारा मिल जाता है। भारत-चीनी व्यापार का यह मुख्य द्वार है। इसलिए यह ज्यादा संवेदनशील इलाका है। सिर्फ यही हिस्सा ही नहीं बल्कि सिक्किम का भूगोल भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसीलिए यहां के बहुत बड़े हिस्से पर भारतीय सेना की मौजूदगी देखी जा सकती है। सिक्किम की महत्ता को आप ऐसे समझ सकते हैं कि उत्तर और पूर्व में चीन, पूर्व में भूटान और पश्चिम में नेपाल और पश्चिम बंगाल सीना ताने खड़े हैं। इन्हीं सब कारणों की वजह से यहां सेना की तरफ से सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किये जाते हैं। प्रतिदिन कुछ गाड़ियों को (सौ से भी कम) नाथुला का परमिट मिल पाता है। हमारा दुर्भाग्य था कि हमें परमिट दो दिनों तक नहीं मिला।


लेकिन हम छांगु लेक और प्रसिद्ध बाबा मंदिर जरुर घूम आए। यहां के लिए रोज लगभग बारह सौ गाड़ियों का परमिट जारी किया जाता है। छांगु लेक पहुंचने से पहले हमारे ड्राइवर ने ठंडी हवाओं का डर दिखाकर बहुत ही महंगे गर्म कपड़े हमें किराये पर दिलवा दिए। वैसे इन किरायों के गर्म कपड़ों का थोड़ा बहुत उपयोग हम बाबा मंदिर पर पहुंचने और रास्ते में पड़े बर्फ से खेलने में ही कर पाए। बाबा मंदिर, किसी देवता या भगवान का मंदिर नहीं है बल्कि यह भारतीय सेना के जवान हरभजन सिंह के स्मृति में बनाया गया है।

इसके पीछे की कहानी ये है, ‘एक दिन हरभजन सिंह अपनी ड्यूटी से वापस नहीं लौटे। न ही उनकी कोई जानकारी मिल पा रही थी। ऐसी मान्यता है कि सिपाही हरभजन सिंह अपने साथी जवान के सपने में आए और अपने समाधि निर्माण के लिए अनुरोध किया। यह घटना सन् 1968 की है।’ आज भी लोग बाबा हरभजन सिंह के मंदिर में कई सारी मन्नतें मांगते हैं। लोगों में यह भी प्रचलित है कि बाबा हरभजन सिंह आज भी अपनी ड्यूटी करते हैं।

बाबा मंदिर के पास मे ही एक ठंडे पानी वाला झरना है। यहां पर शिव की एक विशाल प्रतिमा भी लगाई गई है। बाबा मंदिर से लौटते समय हमारे साथियों ने याक की सवारी का मजा लिया और ढेर सारी फोटुएं खिंचवाई।

सिक्किम की वादियों के अलावा वहां के लोगों का व्यवहार भी बहुत ही सुंदर और प्रशंसनीय है। यहां पर मुख्यत: तीन तरह के समुदाय हैं: नेपाली, भूटिया और लेपचा। यहां की राजकीय भाषा नेपाली है। आमजन राजनीतिक रूप से ज्यादा सक्रिय नहीं हैं। जिसका परिणाम यह है कि पिछले 24 सालों से सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के पवन चामलिंग लगभग निर्विरोध रूप से राज्य के मुख्यमंत्री हैं। सिक्किम की मुख्य सड़कें सीमा सड़क संगठन के हाथों में है इसलिए सड़कों की स्थिति अच्छी हैं। यहां पर ट्रैवेलिंग का खर्च मुझे महंगा लगा। होटल का किराया सामान्य शहरों की तरह ही था। हमने गंगटोक शहर के चप्पे-चप्पे को छान मारा। आसपास की हसीन वादियों का मजा लेने के बाद शाम बिताने के लिए सबसे मुफीद जगह है गंगटोक का सबसे खास इलाका महात्मा गांधी मार्ग, जो शिमला के मॉल रोड की याद दिला देता है।

बारिश के बाद एम जी मार्ग

यहीं पास में लगा लाल बाजार किसी बहुमंजिला इमारत की तरह है। जिसमें महात्मा गांधी मार्ग से घुसकर कई तले नीचे उतरते हुए स्थानीय बाजार का आनंद लेते-लेते हम एक सिनेमाघर के पास पहुंच जाते है। लाल बाजार के ऊपरी तले से गंगटोक शहर का दृश्य बहुत ही मनोरम होता है।

सिक्किम में बहुत कुछ घूमने को छोड़ आया हूं फिर भी जितना घूमा वह एक शानदार अनुभव रहा।


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