कानपुर का गंगा मेला: जब होली के रंगों से हार गए थे अंग्रेज

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कानपुर में होली सिर्फ एक दिन नहीं मनायी जाती। होलिका दहन से लेकर गंगा मेला, जो हिंदी तिथि के हिसाब से अनुराधा नक्षत्र पड़ने पर मनाया जाता है, तक होली मनायी जाती है। इसके पीछे की कहानी अत्यंत दिलचस्प है।

सन् 1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था, कानपुर के हटिया इलाके के कुछ युवकों ने होली के दिन काफी ऊंचा तिरंगा फहरा कर और गुलाल उड़ाकर होली मनायी। तिरंगा फहराने की जानकारी मिलने पर अंग्रेज पुलिस सक्रिय हो गयी और हमीद खान, बुद्धूलाल मेहरोत्रा, नवीन शर्मा, गुलाब चंद्र सेठ, विश्वनाथ टंडन, गिरिधर शर्मा समेत कई नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया।

तस्वीर साभार: फेसबुक/यूनाइटेड कानपुर

गिरफ्तारी के विरोध में शहर के लोगों ने इन नौजवानों की रिहाई तक अपने रंग लगे चहरे न साफ करने का निर्णय लिया। पूरा बाजार बंद कर दिया गया और कई प्रतिष्ठान भी बंद कर दिये गये। होली के तीसरे दिन तक इस विरोध ने आंदोलन का रूप ले लिया और ये आंदोलन इतना तीव्र हो गया कि पांचवे दिन इन सभी नौजवानों को रिहा कर दिया गया। उस दिन अनुराधा नक्षत्र की तिथि थी।

इन सभी नौजवानों की रिहाई की खुशी में हटिया समेत पूरे शहर में दोबारा होली मनायी गयी। होली का जुलूस निकाला गया और सरसैया घाट पे जमकर रंग खेला गया। तब से कानपुर में होलिका दहन से लेकर गंगा मेला (अनुराधा नक्षत्र) तक होली खेली जाती है और गंगा मेला के दिन जुलूस भी निकाला जाता है। हालांकि किसी भी प्रथा की तरह आज कानपुर की ये प्रथा भी सांकेतिक रूप ले चुकी है लेकिन पुराने लोग बताते हैं कि आजादी के कई सालों बाद तक कानपुर (खासकर हटिया) के लोग गंगा मेला तक न अपने चहरे का रंग साफ करते थे और न कपड़े बदलते थे।

तस्वीर साभार: फेसबुक/अजय मेहरोत्रा

इस तरह कानपुर का गंगा मेला प्रतीक है, रंगों द्वारा व्यवस्था के विरोध का और बताता है होली के त्यौहार के धर्म और जाति से ऊपर उठकर एक समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान की कहानी।

जय हिंद, जय भारत!


ये खूबसूरत सी जानकारी लिख भेजी है गौरव त्रिपाठी ने। गौरव हिंदी कवि हैं। समसामयिक विषयों पर इनकी एक-एक कविता लाखों दिलों पर ठांय करके निकलती है। ‘श्री राम अदालत में’ और ‘ग़ालिब हवालात में’ शीर्षक से गौरव के दो कविता वीडियोज ने सोशल मीडिया पर धमाल मचा रखा है। गौरव कानपुर से हैं। कविता करने के साथ-साथ कहानियां और फिल्में भी लिखते हैं। विज्ञान और इतिहास में खासी रुचि है। सुरमयी मुस्कान के मालिक गौरव का फेसबुक बायो कहता है, ‘हँसी मेरी न देखिये, मेरे ख़याल देखिये’।


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