रोचक होने के बावजूद हिंदी में यात्रा लेखन कम क्यों? 

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तस्वीर: ऋषभ देव
घूमना किसे नहीं पसंद? ट्रैवेल तकरीबन तकरीबन हर किसी की विशलिस्ट में टॉप पर होता है। हां, कुछ लोग हैं जिन्हें एक कमरे में दुबके रहना ही भाता है लेकिन उनकी संख्या उतनी ही कम है जितनी कि आम को नापसंद करने वाले लोगों की।
कुल मिलाकर जमा प्रश्न ये है कि जब यात्रा के बारे में पढ़ने, सुनने, देखने, जानने के लिए उत्सुक लोगों की इतनी भारी संख्या है तो यात्रा साहित्य में इतना टोटा क्यों है? और बात जब हिंदी साहित्य की हो तो गिने-चुने नाम ही याद आते हैं। अगर आप हिंदीभाषी हैं और हमारी पीढ़ी के सामान्य पाठक की श्रेणी में आते हैं तो राहुल सांकृत्यायन जी के यात्रा-संस्मरणों, किताबों के अलावा इक्का दुक्का विष्णु नागर और अज्ञेय के घुमक्कड़ी वाले लेख ही पढ़े होंगे। एक बड़ा नाम और जेहन में आता है और वो है निर्मल वर्मा का। लेकिन उन्होंने भी ज्यादातर अपनी विदेश यात्राओं के बारे में लिखा है। भारत की अतुलनीय खूबसूरती के बारे में साहित्य कम ही हैं।

भारत की जिस विविधता वाली खूबसूरती के बारे में लंबे-चौड़े मुहावरे गढ़े जाते हैं, उसको शब्द के रूप में, चित्र के रूप में, वीडियो के रूप में व्यापक तौर पर क्यों नहीं उकेरा जा रहा। हाल के कुछ सालों में फेसबुक और ब्लॉग की लोकप्रियता ने घुमक्कड़ प्रेमियों को जरूर एक प्लैटफॉर्म दे दिया है, जहां पर वो अपने अनुभव, रोमांच, सीखों, सलाहों को लोगों तक पहुंचा सकते हैं।
इस प्रगति ने एक आशा की किरण दी है कि हिंदी में यात्रा लेखन का भविष्य उज्जवल है। हमारी ये साइट उसी दिशा में एक अदना सा कदम है। ट्रैवेल के बारे में अंग्रेजी में भतेरी वेबसाइट हैं, हम लोग जैसे कुछ हद तक बाइलिंगुअल लोग उन्हीं से काम चला लेते थे। लेकिन हिंदी में यात्रा के बारे में पढ़ने का अपना ही मजा है। जितना ज्यादा लिखा जाएगा हिंदी में, शूट किया जाएगा, उतना ज्यादा आम लोग भी यायावरी के आनंद को पहचान पाएंगे। और खुद भी घुमक्कड़ी करने के लिए प्रेरित हो पाएंगे।

जैसा कि सांकृत्यायन जी का सपना था कि क्या मर्द, क्या औरत, सबको झोला बांधकर घूमने निकल जाना चाहिए, खुद को तलाशना चाहिए; ‘चलत मुसाफ़िर’ भी यही उद्देश्य है कि हम ज्यादा से ज्यादा लोगों को घूमने के लिए प्रेरित कर सकें, घूमने के बारे में लिखने के लिए प्रेरित कर सकें। और सबसे जरूरी बात भारत के कोने-कोने में फैली हुई खूबसूरती को खुद भी आत्मसात कर सकें और लोगों को भी ये सुख अपने चश्मे से दिखा पाएं।

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