हवाओं को एक ओर धकेलते हुए जब सब छोड़ कहीं उड़ जाने का मन करे

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घड़ी की सुई की तरह दौड़ता यह शरीर भी, कभी एक सुई सा हो जाता है। सुई ‘1’ से ‘2’ की ओर बढ़ती और ‘2’ से ‘3’ की ओर। हम बिस्तर से उठकर वॉशरूम की ओर बढ़ते है और फिर वॉशरूम से दफ्तर की ओर। दिन खत्म होते-होते सुई अंत में फिर 12 को छू कर एक नया दिन ढूंढ लेती है और हम दोबारा बिस्तर में खुद को गूंध के एक नयी सुबह। और फिर से अगले दिन को बदली हुई तारीख के साथ अपना लेते हैं। घड़ी की सुई जड़ है, स्थिर है, संवेदनहीन है। उसमें कोई चेतना नहीं, वह एक मशीन है। उसी तरह से हर दिन, सुई 12 से उठ कर 1 से मिलकर अपने दिन की शुरुआत करती है और अंत में 12 पर सीमट का दिन का अंत। मगर हम इंसान हैं, हमारे अन्दर चेतना भी है और संवेदना भी है। अगर हमने अपने एवं मशीन के बीच के इस अंतर को मिटा दिया तो ये मशीनें इंसानों को मिटा देंगी।

हमारा जीवन भी अगर घड़ी की इसी सुई सा कहीं घूमता है तो उसका टूटना जरूरी है। मशीन सी दौड़ती हमारी जिंदगी के बीच भाग निकलना जरूरी है। लेकिन निकल कर कहां जाएं? ये भी एक सवाल है। इसका जवाब है, शायद वहां जहां आप बस खो जाना चाहते है। गुम हो जाना चाहते है। वो समन्दर की लहर हो सकती हैं, पहाड़ की चोटी हो सकती है, नदी का किनारा हो सकता है, रेतीला मरुस्थल हो सकता है, या खुली बालकनी। हाथों में चाय का कप  हो या बैकग्राउंड में कोई पसंदीदा गाना या यह कुछ भी हो सकता है। बस कुछ होना जरूरी है, बहुत जरूरी।

ऐसे ही कुछ महीने पहले दफ्तर का समय बताने वाली यही सुइयां चुभने सी लगी थी। लगा कि बस निकल भागें, इस मशीनी दुनिया से निकल कर एक अलग दुनिया में। जिसके लिए निकल पड़े हम एक ऐसे सफर पर जहां किसी सुई की चुभन नहीं बल्कि ठंडी हवा का कोमल एहसास था।

रात के तकरीबन 11 बजे यमुना बैंक से मिली वैशाली की आखिरी मेट्रो पर सवार हो लिए। आनंदविहार आईएसबीटी स्टेशन पर उतर कर उत्तराखंड परिवहन की बस की खोजी। जहां टिकट की कुछ तोल-मोल के साथ उस पर सवार हो गए। सुबह के तकरीबन पांच बजे हम ऋषिकेश पहुंचे। जुबान को जरूरत थी चाय के एक कप की। पहाड़ों के पीछे एक ओर उगते हुए सूरज की कुछ किरणें चोरी से ऐसे झांक रही थीं जैसे  कोई निहार रहा हो। इस नजारे भर ने हमें यह बता दिया था कि आगे का दिन कैसा बीतने वाला है। कैंप वगैरह का इंतजाम  किया। इसके बाद छोटे भाई उत्तर प्रदेश की खूबसूरती निहारने का मन किया। जिसने सन 2000 में अपना अलग घर बसाया है। कुछ दूर तक चलने पर सब कुछ सामान्य था। चाय की कुछ दुकानें, कुछ मिठाई एवं प्लाटिक के डिब्बों की दुकानें लगी थी। कुछ दूर पर ही चंद सीढियां नजर आई जिन्हें देख कर लग रहा था, ये कोई पाथवे है या उस तरफ कुछ बस्तियां होंगी। लेकिन पूरी सीढियां चढ़ने के बाद उस तरफ जो था, उसका किसी को जरा भी अंदाजा न था, खासकर हम लोग जिन्हें इस जगह के बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी।

कई बार बिना जानकारी के भी घूमना अच्छा होता है। हर कदम कुछ नया मिलता है, बिलकुल नया। दूर पहाड़ की चोटियों से लड़खड़ाती सुबह, उगते सूरज की मद्धम रोशनी में गंगा का शुद्ध पानी ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ की चोटी से किसी ने मोतियों की माला बस तोड़कर बिखेर दी हो जो बस चलते-चलते नीचे आ रही है। गंगा के ऐसे रूप को नंगी आंखों से मैंने पहली बार देखा था। सुबह-सुबह पूजा अर्चना, योग एवं सूर्य नमस्कार करने के लिए साधु-संतों के साथ देशी-विदेशी सैलानियों की भीड़ उमड़ती रहती है। इसके बावजूद गंगा की उस निर्मल धारा में एक अनूठी शांति थी। नदी किनारे सुबह की ठंडी हवा के थपेड़े अन्दर तक ऊर्जा भर दे रहे थे। कुछ घंटे घाट पर बिताने के बाद सफर की सारी थकावट कहां छूमंतर हो गई, पता ही नहीं चला।

कैंप तक पहुंचने के लिए अभी तकरीबन 25 किलोमीटर का रास्ता और तय करना था। दूर पहाड़ की ऊंचाइयों से गंगा की धारा ऐसी लग रही थी मानो किसी ने इंक की बोतल ऊंचे हिमालय से लुढ़का दी हो जिससे नीली स्याही यहां-वहां बस खुद अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ रही थी। शाम हो रही थी। हम अपने कैंपों में चले गए। वहां से नदी के बहते पानी का नजारा देखते बनता था। रात के अंधेरे में चुप सन्नाटे के बीच नदी का कल-कल आवाज कानों की गहराइयों में उतर कर घुल रही थी। इन्हीं मीठी आवाजों के बीच रात कट गई और अगली सुबह घनी पहाड़ियों के बीच छोटी सी समतल जगह पर बने बस स्टॉप पर हमने दिल्ली के लिए बस पकड़ी। इस सुंदर सफर की तमाम यादें, कुछ दिल में तो कुछ कैमरे में समेटते हुए इस पावन देवभूमि से अलविदा ली।

और अगले दिन एक बार से घड़ी की सुइयों के साथ कदम ताल शुरू कर दी।

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