आमेर का किला: राजपूताना विरासत का एक अनोखी नगीना

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राजस्थान जिसे मैंने कभी देखा नहीं था, उसकी खूबसूरती के किस्से सुन रखे थे। मेरे कई दोस्तों ने राजस्थान का गुणगान बहुत किया था, इंटरनेट पर भी फोटोज में ही देखा था। ऐसे ही एक दिन अचानक दिमाग में आया कि आज ही राजस्थान को देखने निकलना है। दिल्ली के अपने कमरे से अपना छोटा-सा बैग उठाया और निकल पड़ा आईएसबीटी कश्मीरी गेट की ओर। जहां से मुझे बस पकड़नी थी ऐसे शहर के लिए, जहां इतिहास का वैभव आज भी बरकरार है, जयपुर।

25 जनवरी 2019 की रात को मैं आईएसबीटी बस स्टैण्ड पर इधर-उधर चल रहा था। मैं जयपुर जाने की बस ढूंढ रहा था। पूरे बस स्टैण्ड पर उत्तराखंड, हिमाचल और हरियाणा जाने वाली बसें हीं दिख रहीं थीं लेकिन जयपुर जाने वाली कोई बस नहीं दिख रही थी। मैं लगभग एक घंटा घूमता रहा लेकिन मुझे जयपुर जाने के लिए कोई भी बस नहीं मिली। मैं निराश होकर वापस मेट्रो की ओर जाने की सोचने लगा। तभी एक आखिरी बार ट्राई करने का सोचा। मैं  फिर लौटा और बार बस देखने लगा। तभी मुझे एक आवाज  सुनाई दी, जयपुर-जयपुर। मैं दौड़कर उसी ओर भगा और जयपुर का टिकट मांगा।

jaipur bus stand

उसने मुझसे पूछा अकेले हो। मेरे हां कहते ही जयपुर जाने की टिकट और बस मुझे दे दी गई। रात के 11 बज रहे थे, बस धौलाकुआं के रास्ते पर थी। रोड के दूसरी तरफ बड़े-बड़े ट्रक निकल रहे थे, जिसमें झांकियां लगी हुईं थीं, जो कल गणतंत्र दिवस पर राजपथ पर मार्च करने वालीं थीं। उसके बाद मैं सो गया और जब आंख खुली तो बस राजस्थान की रोड पर चल रही थी। कुछ देर बाद अंधेरे में ही बस जयपुर शहर में दाखिल हुई। शहर सुबह के अंधेरे में पूरी तरह से शांत था। आधा शहर पार करके बस सिंधी बस स्टैण्ड पहुंच गई। राजस्थान की धरती पर उतरकर मैंने सुकून की सांस ली।

अब मुझे देखना था कि इतनी सुबह शहर में क्या-क्या देखा जा सकता है? मैंने पता किया तो पता चला कि घूमने की सभी जगहें 8 बजे के बाद ही खुलती हैं। मैं निश्चय नहीं कर पा रहा था कि अब कहां जाऊं? तभी मैं चल दिया शहर की ओर, ये सोचते हुये कि चलते-चलते सुबह हो ही जाएगी, तब तक शहर को पैदल नाप लेता हूं। बस स्टैण्ड के बाहर निकला तो माहौल वैसा ही था जैसा हर शहर के बस स्टैण्ड का होता है। बहुत सारी टैक्सियां खड़ीं थीं। चाय-नाश्ते की टपरी लगी हुई थी और बड़े-बड़े होटल थे। मेट्रो भी बनी हुई थी जो चांदपोल तक गई हुई थी। लेकिन फिलहाल वो सिर्फ बनी हुई थी, शुरू नहीं हुई थी।

jaipur amer fort
किले में असामां छूते कबूतर

चलते-चलते मैं शहर को देख रहा था और देख रहा था जयपुर की गलियां। थोड़े ही आगे चलते ही मुझे ऊंट-गाड़ी मिल गई। उसे देखकर मैं मुस्कुरा उठा और मन ही मन कहा: हां, मैं राजस्थान में ही हूं। कुछ देर चलने के बाद मैं एक चौराहे पर आकर खड़ा हो गया। जहां भैंसें चारा खा रहीं थीं। मैं अब तक बहुत चल चुका था। मुझे यूंही चलते रहना, समय बर्बाद करना लगा और आसपास होटल देखने लगा। मैंने इंटरनेट पर होटल देखा लेकिन मिल गई डॉरमेट्री। जहां मैं खड़ा था वो डॉरमेट्री पास में ही थी। मैं डॉरमेट्री में जाते ही अपने ही बिस्तर पर सो गया। डॉरमेट्री मेरे लिए सही थी, मुझे शहर देखना था इसलिए डॉरमेट्री सस्ती भी थी और अच्छी भी। कुछ देर बाद उठा तो देखा कि 9 बज रहे हैं। जल्दी से तैयार हुआ और निकल पड़ा जयपुर शहर को देखने।

आमेर किला

मैं फिर उसी चौक पर आ खड़ा हुआ। जहां अंधेरी सुबह में बस स्टैण्ड से चलकर आया था। मैंने ऑटो वाले से आमेर किला के लिये जाने का रास्ता पूछा। मैंने पूछा तो था रास्ता लेकिन वो खुद ही आमेर, जयगढ़ और नाहरगढ़ किला दिखाने को राजी हो गया। लेकिन जो पैसे वो मांग रहा था वो बहुत ज्यादा और थे। वो 2000 में सब घुमाने की बात कह रहा था। मैंने उसे जाने को कहा और कैब देखने लगा। जब मैंने कैब वाले को कॉल किया तो एक कैब वाले ने तो जाने से मना ही कर दिया क्योंकि किला पहाड़ी पर है। उसके बाद ऑटो कैब वाला मान गया और मैं चल पड़ा आमेर किला।

amer fort jaipur
दूर से देखो आमेर किला।

आमेर किला शहर से 11 किलोमीटर दूर अरावली की पहाड़ियों पर स्थित है। किले की ओर जाने का रास्ता ऊंचाई पर था। पहाड़ी पर जाते-जाते रोड संकरे होते जा रहे थे। मगर आसपास पहाड़ और पेड़ नजर आ रहे थे। यहां से जलमहल भी अच्छा दिख रहा था जो शहर में ही है। कुछ ही मिनटों में ऑटो ने मुझे आमेर छोड़ दिया। कैब से मुझे यहां तक आने के सिर्फ 60 रुपये ही लगे। आमेर किला ऊंचाई पर है इसलिए बाहर से ही किले की बनावट दिखती है। किले को दूर से देखने पर लगता है कि पीले चूने की कलई पुतवा दी हो। लेकिन वो बड़े-बड़े गुंबद मुझे आकर्षित कर रहे थे।

in amer fort jaipur

किले तक जाने के लिये पहले आरामबाग जाना पड़ता है। मैं जैसे ही दिल आरामबाग पहुंचा। वहां सैकड़ों की संख्या में कबूतर दाना चुग रहे थे। जब वे एक-साथ जमीं से आसमां की ओर उड़ते, वो दृश्य और वो फड़फड़ाहट वाली आवाज ने मेरा मन मोह लेती।  किले तक जाने के लिये बहुत सारी सीढ़ियों को चढ़कर जाना होता है। उन सीढ़ियों से पहले दिल आरामबाग आता है। जहां फूल, क्यारियां देखते हुए आराम से बैठा जा सकता है। मैं जल्दी किले को घूम लेना चाहता था। मैं जल्दी-जल्दी सीढ़ियां चढ़ने लगा। पूरा रास्ता सैलानियों से भरा हुआ था। सीढ़ियां चढ़ते ही मुझे हाथी दिखाई दिये। हाथियों को रंगों से सजाया गया था। जिस पर महावत और कुछ लोग बैठकर मजा ले रहे थे। हाथी लोगों को नीचे से ऊपर ला रहा था। कुछ लोगों के लिये यहां यही रोजी-रोटी का साधन बना हुआ था।

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आमेर किला जाने का रास्ता।

कुछ देर बाद मैं एक बड़े-से गेट से किले के अंदर पहुंचा। यहां आकर किला एकदम समतल हो गया था। यहां सब कुछ सपाट था। मैं जिस जगह खड़ा था, वहां ऐसा लग रहा था कि ये किले का आंगन है। वहीं आगे जाने पर टिकट काउंटर मिला। भारतीय पर्यटकों के लिये टिकट 100 रुपये का था। लेकिन अगर आप विद्यार्थी हैं और काॅलेज आईडी है तो टिकट मात्र 10 रूपये का पड़ेगा। मेरे पास कोई आईडी नहीं थी सो मैं 100 रुपये देकर किले की ओर बढ़ गया।

दीवान-ए-आम

आमेर किला जो अंबेर शहर के पास में बसा है। इस बस्ती पर पहले मीणा समुदाय का राज था। बाद में इस पर राजपूतों ने कब्जा कर लिया। जिसके बाद आमेर किला का निर्माण 1589 में राजा मानसिंह ने शुरू करवाया। उसके बाद अलग-अलग राजा आते रहे और इस किले का निर्माण बढ़ाते रहे। इस किले का पूरा निर्माण 1727 में खत्म हुआ।

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किले का प्रथम तल, दीवाने-ए-आम।

मैं किले के पहले तल पर पहुंच गया। जिसे दीवान-ए-आम कहा जाता है। इस जगह पर राजाओं की सभा होती है। यहां पर राजा प्रजा, अधिकारियों, मंत्रियों से मिला करते थे। दीवाने आम की बनावट बेहद पुरानी लगती है। इसकी छज्जे और दीवारें लाल-बलुआ पत्थर की है और खंभे संगरमर के हैं। जिसकी चमक आज भी बनी हुई है। इस जगह से पहाड़ियां, आमेर सिटी दिखती है। उस दिन शायद यहां कोई प्रोग्राम था, किले के इस तल पर स्टेज बना हुआ था और बहुत सारी कुर्सियां पड़ी हुई थी। यहीं पर एक बड़ा सा स्नानघर है जिसे ‘हम्माम’ कहा गया है। जहां पर राजपरिवार स्नान करता था।

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किले से दिखता अंबेर शहर।

इसके बाद आगे कुछ सीढ़ियां चढ़ने पर एक और तल आता है ‘दीवाने-ए-खास’। आमेर किले का सबसे ज्यादा आकर्षण का केन्द्र यही है। यहां पर राजा अपने अतिथियों से मिलते थे। इस तल पर शीश महल बना हुआ है। जिसमें कांच से पूरा शीश महल जड़ा हुआ है। इस जगह पर कैमरे से रिकाॅर्डिंग भी होती रहती है। एक गाइड ने बताया कि रानी यहां रात को बहुत सारे दिये रखती थी जिससे ये शीश महल जगमग होने लगता था। दिन की रोशनी में शीश महल इतना सुंदर लग रहा था। तो बस सोचा ही जा सकता है कि रात की जगमग में इस महल की क्या छंटा रहती होगी।

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शीश महल के अंदर।

उसी तल पर एक बाग भी बना हुआ है। जो इस जगह को और भी सुंदर बना देता है  महल के बीचों-बीच ये बाग जिसके हर पेड़ की कटाई करीने से की गई है और उसके बीच में  है एक फुव्वारा। ये सब शीश महल की सुंदरता को बढ़ा रहे थे। इस जगह पर बहुत भीड़ थी। इस जगह की खूबसूरती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोग इस जगह पर आकर आगे नहीं बढ़ रहे थे। इसकी सुंदरता देखकर यहीं रुक जा रहे थे।

मानसिंह महल

शीश महल को देखकर मैं आगे बढ़ गया। आगे महल की एक और सुंदरता मेरा इंतजार कर रही थी, मानसिंह महल। यह पूरे किले का सबसे प्रमुख भाग है। महल के बीच में एक प्रांगण है, जिसे कुछ खंभों से एक छज्जे का रूप दिया गया है। उसके चारों तरफ कमरे ही कमरे थे। ऐसे ही कमरों को मैं देख रहा था। दीवारों पर फूल-पत्तियों और कुछ भगवान के चित्र बने हुये थे। यहीं पर राजा, अपनी महारानियों के साथ समय बिताते थे।

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उसके बगल में ही ‘जनानी ड्योढ़ी’ है। यहां पर राजपरिवार की महिलायें और दासियां रहती थी। ये कमरे आज भी बहुत सुंदर लग रहे थे। हर कमरे में चित्रकारी और सफाई बहुत थी। कमरों की नक्काशी बेहद महीन और सुंदर है। पूरे महल की नक्काशी अलग-अलग है लेकिन फिर भी बेहद बेहतरीन। इन महलों से राजपूतों की वैभवशाली इतिहास का अनुमान लगाया जा सकता है। मैंने इससे पहले जो महल व किले देखे थे, वे इस किले के सामने बौने थे। शायद इसलिये इतिहास की फिल्मों की शूटिंग के लिये राजस्थान को ही चुना जाता है। जो आज भी अपनी खूबसूरती बरकरार रखे हुये हैं।

man singh mahal amer fort

मैं किले की छत और छज्जे को देखने लगा। मैं नहीं चाहता था कि आमेर किले का कोई कोना मुझसे छूट जाये। किला पूरा भूलभुलैया की तरह है। आप एक बार जहां से आते हैं, उस जगह पर दोबारा नहीं आ सकते। पता ही नहीं चलता, कहां से ऊपर आये और कहां से नीचे उतरे। किले की सबसे उपरी छत से बाहर पहाड़ ही पहाड़ देख रहे थे और किले की सुरक्षादीवारी। किले को देखने के बाद अब मुझे बाहर निकलना था क्योंकि मुझे जयगढ़ किला और नाहरगढ़ किला भी जाना था। लेकिन नीचे उतरते वक्त मेरी नजर एक जगह पर पड़ी। जहां लिखा था सुरंग में यहां से जाएं।

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मैंने देखा, नीचे सीढ़िया गई हुई हैं लेकिन अंधेरा और शांति मुझे डरा रही थी। एकबारगी मैं पीछे मुड़ा लेकिन फिर हिम्मत करके सीढ़िया उतरने लगा। नीचे उतरते ही कई लोगों की आवाज सुनाई दी और यहां लाईट भी थी। सुरंग वैसी नहीं थी जैसी फिल्मों में दिखती है। सुरंग इतनी ऊंची और चौड़ी थी कि एक बड़ी गाड़ी आराम से खड़ी हो सकती थी। मैं सुरंग देखकर आगे चल पड़ा। कुछ ही देर में फिर से उन्हीं सीढ़ियों पर था जिसको चढ़कर आमेर किले को देखने आया था। अब रास्ते में लोगों की भीड़ ज्यादा बढ गई थी और रोड पर भी गाड़ियों की आवाजाही थी। मैं अब तक एक सुंदर, बेहतरीन और वैभव का प्रतीक आमेर किले को देख चुका था। मुझे अभी ये शहर और भी बहुत कुछ दिखाने वाला था। अब मेरा अगला पड़ाव था, जयगढ़  और नाहरगढ़।


गुलाबी शहर जयपुर के बारे में हमें ये अलहदा सा यात्रा-वृतांत लिख भेजा है ऋषभ देव ने। अपने बारे में वो बताते हैं, अपनी घुमक्कड़ी की कहानियां लिखना मेरी चाहत और शौक भी। जो भी देखता हूं, उसे शब्दों में उतारने की कोशिश में रहता हूं। कहने को तो पत्रकार हूं, लेकिन फिलहाल सीख रहा हूं। ऋषभ मूलतः वीरों की भूमि बुंदेलखंड से हैं।


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