तुंगनाथ 2: बर्फीले पहाड़ों को छू पाना, एक दिवास्वप्न का पूरा हो जाना

0
559
views

पहाड़, नाम सुनकर ही मेरे दिल को जाने क्यों सुकून मिल जाता है। हर बार पहाड़ों में जाना एक नया एहसास होता है। टेढे-मेढ़े रास्तों पर पैदल चलना, डंडों के टेक से अपने पैरों को सम्हालते रहना, इन सब क्रियाओं का अपना ही मजा होता है। ऐसे ही कई प्रफुल्लित क्षणों से भरा सफर था उत्तराखंड के तुंगनाथ का।

हरिद्वार से चोपता की यात्रा बेहद सुकून और थकान भरी थी। इतने घंटों से हम बस गोल-गोल घूमे जा रहे थे। रास्ते में सफेद चादर ने जरूर एनर्जी भर दी थी। हम सफेद चादर को देखकर खुश हो रहे थे क्योंकि हमें लग रहा था वो दूर तलक दिख रहीं सफेद पहाड़ियां केदारनाथ की हैं। और उन सफेद पहाड़ियों को हम कुछ ही देर बाद बिल्कुल नजदीक से देखने वाले थे। वो सफेद चादर हमारा तुंगनाथ में इंतार कर रही थी और हम इस बात से बिल्कुल बेखबर थे।

चोपता की सड़क।

हमारी बस चोपता शाम के तीन बजे पहुंची। बस के बाहर उतरे तो अचानक तेज सर्द हवाओं ने हम पर हमला कर दिया। हमने सोचा नहीं था कि मई के महीने में भी तुंगनाथ इतनी ठंड से हमारा स्वागत करेगा। हम सब अपने गर्म कपड़े लाये थे। थोड़ी ही देर में हम तुंगनाथ की ओर जाने के लिए तैयार हो गये। चोपता के चौराहे पर हम खड़े हुये थे, आसपास कुछ ही दुकानें थे। मैंने अपने काम की दुकान देखी और पहुंच गया डंडा लेने। तुंगनाथ की चढ़ाई चोपता से 3-4 किलोमीटर है लेकिन बस के सफर की थकावट हावी थी इसलिए डंडा चढ़ाई करने में कामगर था।

तुंगनाथ चढ़ाई

हम सब एक पक्की रोड पर चलने लगे जो शायद तुंगनाथ तक बनी हुई थी। शुरूआत में सबसे बड़ी परेशानी थी, थकान। जो हमारे चलने की गति को धीमा कर रही थी। हमें अंधेरा होने से पहले नीचे भी आना था। हमें पहले ही निर्देश मिल चुका था कि जो जहां तक चढ़ पाए, चढ़े। वापसी में उन्हीं लोगों के साथ वापस आ जाये। मैं हार नहीं मानने वाला था। मैं नहीं चाहता था कि तुंगनाथ आकर भी तस्वीर में ही उस जगह को देखूं।

मैं धीरे-धीरे चलने लगा बिल्कुल सामान्य चाल में। मैं नहीं चाहता था कि स्पीड के कारण इस सफर का आनंद न ले सकूं। शुरुआत में सबके दिमाग पर थकान छाई हुई थी लेकिन थोड़ी देर बाद हम उस चढ़ाई और थकान में ढलने लगे। हम उस चढ़ाई को एंजाय करने लगे।

सफर के एक पड़ाव पर।

मैं जिस सफेद चादर के लिए बस में उछल-कूद कर रहा था वो हमारे सामने ही थी। हम उसके ही पास जा रहे थे। छोटे से रास्ते में बहुत कुछ अच्छा था सुहाना मौसम, शांति और हरा-भरा फैला हुआ मैदान और सफेदी ओढे़ हुये पहाड़। पेड़ों के बीच पहाड़ सुंदर लगते हैं लेकिन सफेदी के लेप में पहाड़ में एक आकर्षण आ जाता है। पहाड़ की इस सुंदरता को देखकर हम असमय ही उसकी तारीफ करने लगते हैं। हम भी वही कर रहे थे कुछ अपने मुंह से तो कुछ तस्वीरों में सहेजकर।

हरा मैदान

पक्की सड़क पर चलते-चलते काफी देर हो गई थी। अचानक सड़क से मिलता हुआ हरा-भरा मैदान मिला। जहां से चलकर हम आगे जा सकते थे। हम थोड़े आगे चले और वहीं लेट गये। देखा-देखी जो भी आता वहीं लेट जाता। कुछ देर मखमली हरी घास पर आराम करने के बाद हमने फिर अपने कदम बढ़ाये। अब चढ़ाई थोड़ी खड़ी हो गई थी जो कुछ लोगों के लिए परेशान कर रही थी।

मौसम सर्द पहले से ही था और हम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, ऊंचाई की वजह से मौसम और ठंडा हो रहा था, सर्द हवाएं भी चल रहीं थीं। चलते-चलते शरीर में गर्मी आ जाती है लेकिन ऊंचाई के कारण हालत खराब होने वाली थी। इन सारी दिक्कतों के कारण चढ़ना और भी मुश्किल हो रहा था। लेकिन हम बीच में रुककर आराम करते और फिर चलते।

रास्ते में चलने वाले बहुत ही कम लोग थे, जो हमारे लिए अच्छी बात थी। हम आराम से चल रहे थे और भीड़ चलने में परेशानी देती है। रास्ते में हमें एक दुकान मिली, जहां हमने कुछ खाने को लिया जो हमें आगे चलने में मदद करता रहे।

रूई के फाहे सी बर्फ

हम चलते-चलते काफी ऊपर आ गये थे। यहां चारो तरफ सुंदरता फैली हुई थी। सामने एक लंबा रास्ता और सफेद चादर में लिपटा पहाड़ हमारा इंतजार कर रहे थे। मैंने वहां से पीछे मुड़कर देखा तो अनेकों पहाड़ियां मानो हमारा इस्तकबाल कर रही थीं एक के पीछे एक खड़े होकर। यही वो नजारा था जो हमें धीरे-धीरे ही सही लगातार चलने की शक्ति दे रहा था। हम हर पल को, हर कदम को जी कर चलते जा रहे थे।

हम चल ही रहे थे, अचानक चेहरे पर कुछ स्पर्श हुआ, लगा कि शायद बारिश होने वाली है। कुछ देर बाद वो स्पर्श बढ़ गया। वो सफेद सा स्पर्श हमारे चारों-तरफ फैलने लगा। हम इसको देखकर खुशी से चिल्ला ही उठे, हम वहीं रुककर उसी सफेदी में एक-दूसरे को, पहाड़ों को देखने लगे। हमने नहीं सोचा था कि मई के महीने में हमारे चारों तरफ भीनी-भीनी सफेदी बरसेगी।

चढ़ाई के बीच में कुछ ठहराव।

उस सफेद बारिश के बाद मौसम में और ठंड होने लगी लेकिन अब हमें ये मुश्किलें अच्छी लगने लगीं थीं। हमारे एक साथी हमें धकेलते और फिर खुद हमारे साथ ही हो लेते। हमें अभी तक सफेद पहाड़ दिख रहे थे लेकिन इतनी ऊंचाई पर पहुंचकर अब तस्वीर साफ होने लगी थी।

तुंगनाथ और कड़कड़ाती ठंड

हम चलते जा रहे थे लेकिन मंदिर अभी तक नहीं दिख रहा था। कुछ ही देर बाद हम ऐसी जगह पहुंचे, जहां से हमें मंदिर दिखाई दे रहा था। कुछ देर बाद हम मंदिर के रास्ते पर ही थे। मंदिर के नीचे कुछ दुकानें थीं जो मंदिर के लिए प्रसाद लेने के लिएबेच रही थीं। मंदिर वैसा ही था जैसा उत्तराखंड में सभी केदार हैं।

जब मंदिर जाने के लिये जूते उतारे और जमीन पर पैर रखा तो ठंड के कारण अचानक पूरे बदन में कपकपी उठ गई। अब जमीन पर चलना बर्फ की सिल्ली पर चलने जैसा लग रहा था। थोड़ी ही देर में ठंड ने मेरी घिग्गी बांध दी। जब मंदिर के अंदर गया तो चैन मिला। वहां से बाहर आकर मेरा बुरा हाल हो रहा था तो जल्दी से अपने जूतों में पैर डालकर खुद को सुकून दिया।

तुंगनाथ से सामने सफेद सुंदरता ओढ़े पहाड़ दिख रहे थे। सफेद आसमान को छूते हुए पहाड़ बहुत सुंदर लग रहे थे। हम अब नीचे की ओर आ रहे थे। हम बार-बार मुड़-मुड़कर उस जगह को देख रहे थे जहां हम अभी कुछ देर पहले खड़े थे।

मोनाल पक्षी।

हम कुछ दूर ही चले तो हमें एक पक्षी दिखा, बिल्कुल मोर की तरह। बस आकार में मोर से छोटा था। ऊपर दी गई तस्वीर के सबसे ऊपरी हिस्से में दिखाई देगा। एक सीनियर ने बताया कि ये ‘मोनाल’ पक्षी है, उत्तराखंड का राजकीय पक्षी। अंधेरा होने लगा था और हम नीचे चलते जा रहे थे। इस अंधेरे के साथ ही सफर खत्म हो जाना था लेकिन भीनी सफेदी का स्पर्श हमेशा ताजा रहने वाला था, ताउम्र।

(ये तुंगनाथ की यात्रा का दूसरा भाग है, पहले भाग में पढ़ें इस खूबसूरत जगह तक की रोमांचक यात्रा के बारे में)


ये अलहदा सा यात्रा-वृतांत हमें लिख भेजा है ऋषभ देव ने। अपने बारे में वो बताते हैं, अपनी घुमक्कड़ी की कहानियां लिखना मेरी चाहत और शौक भी। जो भी देखता हूं, उसे शब्दों में उतारने की कोशिश में रहता हूं। कहने को तो पत्रकार हूं, लेकिन फिलहाल सीख रहा हूं। ऋषभ मूलतः वीरों की भूमि बुंदेलखंड से हैं।

 


ये भी पढेंः

बस्तर: अबूझमाड़ की खूबसूरती के सामने आतंक का माहौल धुंधला पड़ जाता है

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here