छत्तीसगढ़: यहां दशहरा पर लोग रावण क्यों पूजते हैं?

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छत्तीसगढ़ की अनोखी संस्कृति हमेशा से लोगों को अचंभित और आकर्षित करती है। ऐसी ही एक अनोखी संस्कृति और परम्परा है, बलौदा बाजार जिले के गांव बोरसी की। पूरे देश में दशहरा पूरी धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन यहां विजयादशमी यानि दशहरा देश के दूसरे राज्यों से एकदम अलग मनाया जाता है। यहां विजयादशमी पर रावण को जलाया नहीं जाता बल्कि पूजा जाता है। छत्तीसगढ़ में और भी कई स्थान ऐसे हैं जहां दशहरा का ये उत्सव बेहद अलग अंदाज में मनाया जाता है ।

रावण को पूजते है यहां

भाटापारा विधानसभा का हिस्सा ग्राम बोरसी अपनी अनोखी परंपरा के लिए अलग पहचान रखता है। यहां विजयादशमी पर गांव वाले रावण का दहन नहीं बल्कि उसकी पूजा करते हैं। गांव में रावण की बड़ी सी मूर्ति बनी हुई है जिसके आगे गांव वाले पूरी आस्था से शीश झुकाकर अपनी और अपने परिवार की सुख समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं।

राजधानी रायपुर से लगे धरसींवा क्षेत्र के मोहदी गांव में रावण गांव वालों के लिए आस्था का प्रतीक बना हुआ है। जहां रावण की मूर्ति की विशेष पूजा-अर्चना कर गांव में अमन-चैन की मन्नतें मांगी जाती है। करीब आठ दशक से ज्यादा का समय बीत गया है जबसे ग्रामीण सामूहिक रूप से रावण की पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं।

मोहदी गांव के 70 वर्षीय बुजुर्ग दुखुराम साहू का कहना है कि यहां प्रतिवर्ष दशहरा के पर्व पर रावण की सामूहिक पूजा की जाती है। उसने जब से होश संभाला है तब से अपने पूर्वजों को भी रावण महाराज की प्रतिमा का पूजन करते और मनौती मांगते ही देखा है। अपने पूर्वजों की उसी परंपरा को हम आज भी आगे बढ़ा रहे हैं।

गांव के अन्य बुजुर्ग सुनहरलाल वर्मा (68) बताते हैं कि रावण की प्रतिमा के पूजन से ही अब तक गांव में शांति बनी हुई है। जब भी गांव पर किसी भी प्रकार की मुसीबत आती है तो गांव वाले रावण की प्रतिमा पर नारियल चढ़ाते हैं और मत्था टेककर मनौती मांगते हैं। रावण महाराज हर मनोकामना पूरी करते हैं। मोहदी में अकोली मार्ग तिराहे के उत्तर दिशा में रावण की मूर्ति बनी हुई है। इस मूर्ति को हर साल पेंट करके सजाया-धजाया जाता है।

गांव के एक और बुजुर्ग की मानें  तो रावण महाराज उनके हर संकट का निवारण करते हैं। गांव की महिलाएं गर्भवती होने पर अपने परिवार के साथ यहां आकर रावण महाराज की पूजा करते हैं और सब कुछ ठीक-ठाक होने की कामना करती हैं। यहां तक कि राजनेता लोग भी चुनाव के समय यहां आकर मत्था टेकते हैं। नेताओं की मनोकामना पूर्ण होने का प्रमाण वह स्वयं है। इसलिए रावण यहां के लिए अटूट श्रद्धा का केन्द्र का बना है।

मुंगेली- रावण की पिटाई

विजयादशमी के दिन अगर आप छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले में दशहरा मना रहे हैं तो यहां आपको न रावण जलता दिखेगा और न ही उसकी पूजा की जाती है। यहां मिट्टी से रावण का पुतला बनाकर उसे पीट-पीटकर नष्ट किया जाता है। इस परंपरा के पीछे यहां के लोगों का कहना है कि अहंकार को पीट-पीटकर ही नष्ट किया जाता है।

मुंगेली के मालगुजार गोवर्धन परिवार के पूर्वजों के द्वारा कई सालों से मिट्टी के रावण को पीटकर विजयादशमी मनाने की परंपरा रही है। आज भी मुंगेली में वही परंपरा जारी है। लोग जब रावण को नष्ट कर देते हैं तो रावण की मिट्टी अपने घर ले जाते हैं। घर के पूजा स्थान, धान की कोठरी और घर की तिजोरी जैसे स्थान पर रावण की मिट्टी रखने से धन-धान्य में बढ़ोतरी होती है।

इसी तरह छत्तीसगढ़ के कोंडागांव में भी दशहरे के दिन मिट्टी का रावण बनाया जाता है और उसकी नाभी में रंग डालते हैं। रामलीला के मंचन के बाद मिट्टी के रावण को वहीं नष्ट किया जाता है।

छत्तीसगढ़ की ये परंपरा आपको सुनकर जरूर अनूठी लग रही होंगी। लेकिन रावण दहन से प्रकृति को जो नुकसान पहुंचता है उससे तो ये लाख गुना बेहतर हैं।


छत्तीसगढ़ के दशहरे के बारे में हमें लिख भेजा है सत्यप्रकाश पांडेय ने। वो अपने बारे में बताते हैं, छत्तीसगढ़ में 1996 से पत्रकारिता के पेशे से जुड़ा हूं। पिछले 5 साल से वाइल्डलाइफ और नेचर की फोटोग्राफी भी कर रहा हूं। छत्तीसगढ़ के हाथी प्रभावित इलाकों में अंदर तक जाकर खूब काम किया है और जंगली हाथियों की ढेरों तस्वीरें ली हैं। पिछले डेढ़ साल में हाथियों की तस्वीर लेने की फिराक में 3 बार मौत से बचकर लौटा हूं। 


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