क्या हुआ जब देर रात बनारस के घाट पर निकलीं दो लड़कियां

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बनारस शहर से ये मेरी पहली मुलाकात थी। अगर आप में से किसी की बनारस घूमने की इच्छा हो तो घड़ी और कैलैंडर घर पर ही छोड़ कर आएं। यहां बिताया हर पल आपको कम ही लगेगा। अफसोस, मेरे पास सिर्फ चार ही दिन थे यहां रहने के लिए। सच मानिए, चार दिनों में भी मैं सारे गंगा घाट ठीक से घूम नहीं पायी जबकि चारों दिन देर रात तक मैं और मेरी दोस्त घाटों पर ही घूमा करते थे।

बनारस में कुल 84 घाट हैं जिनमें से मैंने तकरीबन उन्यासी-अस्सी तो देख ही लिए होंगे। कुछ तो बहुत बड़े हैं तो कुछ इतने छोटे कि दस कदम में ही खत्म हो जाते हैं। हर घाट अपने आप में अलग है। हर घाट के नाम के पीछे कोई न कोई कहानी जरूर है। कई घाटों में तो किले बने हुए हैं जो कि आज कल रेस्टोरेंट में तब्दील हो चुके हैं और कुछ यूं ही सूनसान पड़े हैं। ज्यादातर घाटों पर पूजा-पाठ होती ही रहती है।

रात आठ बजे दशाश्वमेध घाट का नजारा

पहली बार, रात के करीब 8 बजे होंगे जब हम घाट पर आए। घूमने की शुरुआत दशाश्वमेध घाट से हुई थी। चहल पहल से भरा था ये घाट। खाने-पीने के आयटम बड़े मस्त थे, नींबू चाय से लेकर दोने में मिलने वाली इडली तक। जगह-जगह पर चिलम फूंकते हुए लोग दिख जाएंगे। कई वृद्ध लोग एक जगह बैठकर भजन गा रहे थे। औरतें गंगा में दीपक प्रवाहित कर रही थीं। नौकाचालक बार-बार पास आकर पूछ रहे थे, ‘बोट चाहिए मैडम, पूरे अस्सी घाट घूमाएंगे’। टूरिस्ट गाइड अपनी फेक एक्सेंट वाली अंग्रेजी में हालचाल लेकर जा रहे थे। पर हमने भी ठान लिया था कि सभी घाट हम पैदल ही घूमेंगे।

अगली तीन रातों में तो हम लोग आधी रात तक घाट दर घाट घूमते रहते थे। रात में गंगा और भी ज्यादा सुंदर लगती है। हम पैदल पैदल दशाश्वमेध से अस्सी घाट की तरफ चलने लगे। तेज आवाज में गाना गाते हुए हम अपनी ही धुन में चले जा रहे थे। कुछ लोग हमारी तरफ घूरकर देखते तो कुछ आपस में बाते बनाते। कुछ घाटों पर मजनू टाइप लड़के भी मिले, वो हमारे साथ और जोर से गाना गाने लगते। शायद वो हमें डराना चाहते थे। हमारी आवाज को दबाना चाहते थे।

हमने उनकी ओर ध्यान ही नहीं दिया और अपनी आवाज बुलंद कर के गाना गाते रहे, चलते रहे, घूमते रहे। हमारे आत्मविश्वास को देख कर वो लोग चुप हो गए। शायद ऐसे लोग कमजोर ही होते हैं और सिर्फ डरने वालों को ही डराते हैं। इनके अलावा हमें कई ऐसे लोग मिलें जो हमें इतनी रात को न घूमने की हिदायत देते थे। पर हमने अपनी समझ पर ज्यादा भरोसा किया। जहां तक हमें खुद को सुरक्षित लगा, हम गए। अभी चौरासी घाटों के बारे में बताएंगे तो विकीपीडिया टाइप हो जाएगा आर्टिकल, इसलिए एकदम खास खास घाटों के बारे में जो जानकारियां जुटाए हैं वो पढ़ डालिए।

दशाश्वमेध घाट

दशाश्वमेध, वाराणसी में गंगातटवर्ती सुप्रसिद्ध स्थान है जिसका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। काशीखंड के अनुसार शिवप्रेषित ब्रह्मा ने काशी में आकर यहीं दस अश्वमेध यज्ञ किए। शिवरहस्य के अनुसार, यहां पहले रूद्रसरोवर था परंतु गंगागमन के बाद पूर्व गंगापार, दक्षिण दशहरेश्वर, पश्चिम अगस्त्यकुंड और उत्तर सोमनाथ इसकी चौहद्दी बनी। यहां प्रयागेश्वर का मंदिर है।

अस्सी घाट

सबसे बड़ा है अस्सी घाट, जहां सुबह-ए-बनारस का खूबसूरत कार्यक्रम होता है। सूर्योदय से पहले ही सुबह की आरती होती है। असी और गंगा के संगम के कारण इसका नाम अस्सी घाट रखा गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि सुबह की आरती में मंत्रों का उच्चारण लड़कियां करती हैं। ऐसा मैंने अभी तक तो कहीं और नहीं देखा था।

आदि केशव घाट

यहां विष्णु का प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर है। इसी घाट के पास वरुणा नदी गंगा में जाकर मिल जाती है। ये घाट काफी खराब हालत में है। वरुणा नदी मर रही है, किसी गंदे नाले जैसी हालत हो गई है उसकी। गंगा के सफाई कितनी भी करा लो लेकिन वरुणा में सारी गंदगी फेंक दी जा रही है तो गंगा भी गंदी हो ही रही है। वैसे आपको बता दें कि वरुणा और असी नदी के बीच में बसे होने के कारण ही इस शहर का नाम वाराणसी पड़ा है।

राज घाट

यहां पर दिग्गज नेता बाबू जगजीवन राम द्वारा स्थापित संत रविदास का मंदिर है। इस घाट के बाद अस्सी घाट से चला आ रहा सीधा रास्ता बंद हो जाता है। ये गंगा पर बने घाटों में शुरू से तीसरे नंबर पर है। पहला घाट है आदि केशव घाट

अहिल्या घाट

इस घाट को मध्यप्रदेश की महारानी अहिल्या होलकर ने दोबारा बनवाया था, इसलिए उनके सम्मान में इस घाट का नाम अहिल्या घाट रखा गया है। इसके साथ-साथ यहां लोगों के रहने के लिए कई घर भी बनवाए गए। यहां आपको दो मंदिर भी मिलेंगे, पहला महादेव शिव का और दूसरा हनुमान का।

दरभंगा घाट

दरभंगा के ब्राह्मण राजा ने इस घाट को फिर से बनावया था, इसलिए इसका नाम दरभंगा घाट रखा गया है। इस घाट में एक किला है जिसकी दीवारों को चूना मिट्टी से बनवाया गया है। इस किले में ग्रीक वास्तुकला की छाप देखने मिलती है। कई लोगों ने इसे खरीदकर होटल में तब्दील करना चाहा पर लोगों की मान्यताओं के आगे हार गए।

दिगपतिया घाट

इस घाट का निर्माण दिगपतिया के राजा ने करवाया था। पूरा घाट बंगाली संस्कृति और वास्तुकलाओं से भरा हुआ है। यहां संस्कृत के विद्वान मधुसूदन सरस्वती का निवास स्थान भी है। इस घाट में प्राचीन काली का मंदिर भी दिख जाएगा जिसमें शिव, गणेश और कार्तिकेय की मूर्तियां भी है। हर साल होली की शाम इस घाट का महत्व और भी ज्यादा बड़ जाता है क्योंकि होली हर शाम यहां कार्यक्रम होते हैं।

गंगा महल घाट

वाराणसी के महत्वपूर्ण घाटों में से एक है गंगा महल घाट। इस घाट का निर्माण नारायण सम्राज्य में ही हो गया था जिन्होंने घाटों का विस्तार अस्सी घाट तक किया था। इस घाट में एक महल बना है जिसमें शिक्षा अर्जित करने दूर दूर से लोग आते थे।

अंतिम विदाई

हरिश्चंद्र घाट

हरिश्चंद्र घाट वाराणसी के प्राचीन घाटों में से एक है। इसका नाम राजा हरिश्चंद्र के नाम पर है। मान्यता है कि राजा हरिश्चंद्र ने यहां काम किया था और यहीं पर दान के सही मायनों को समझा था। यहीं उन्हें भगवान ने उनकी सच्चाई के लिए सम्मान दिया था। लोगों का मानना है कि अगर किसी व्यक्ति का अंतिमसंस्कार यहां किया जाए तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

चेतसिंह घाट

इसी घाट पर वॉरेन हेस्टिंग्स और चेत सिंह के सैनिकों के बीच लड़ाई हुई थी। अंग्रेजो ने यहां बने किले पर 19वी सदी में कबजा कर लिया था। इस घाट को खिरकी घाट ने नाम से भी जाना जाता था। अब इसके चार हिस्से हैं जिन्हें चटा सिंह घाट, निरंजनी घाट, निर्वाण घाट और शिवाला घाट के रूप में जाना जाता है। गंगा के तेज बहाव के कारण लोग यहां स्नान से बचते हैँ।

जैन घाट

इस घाट का नाम जैन के 7वें तीर्थांकर सुप्रशवनाथ के नाम पर है। मानयता है इनका जन्म वाराणसी के पास ही हुआ था। इस घाट के आस पास नौका का आना मना है क्योंकि वह बहुत प्रदूषण फैलाते हैं। तीर्थ यात्रियों के बीच अब इसकी लोकप्रियता बड़ी है जिसके कारण घाट की हालत में सुधार आ रहा है।

मणिकर्णिका घाट

यज्ञकुंड में सती के कूद जाने के बाद उनके जले शरीर को शिव वापस कैलाश ले जा रहे थे जहां जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्ति पीठ का निर्माण हुआ। देवी सती का कान का मणि मणिकर्णिका घाट पर गिरा था। मणिकर्णिका घाट प्राचीनतम घाटों में से एक है। यहां लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करते हैं।

मानसरोवर घाट

मानसरोवर घाट और मनमंदिर घाट को अमेर के राजा मान सिंह ने बनवाया है। इसके पास मानसरोवर कुंड भी है। मानयता है कि इस सरोवर में वहीं शक्तियां हैं जो तिब्बत की मानसरोवर झील में है।

घाट पर गंगा पूजन

राजेन्द्र प्रसाद घाट

पहले यह घाट दशाश्वमेध घाट का हिस्सा था। 1979 में भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की स्मृति और सम्मान में इस घाट का पुनर्नामकरण किया गया। 1980 के दशक तक इस घाट को लकड़ी, रेत और पत्थर की प्लेटों के व्यापार से निपटने वाले नौका स्टेशन के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था। 1984 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इस जगह का नवीनीकरण और पुनर्गठन किया गया था। ती

विजयनगरम घाट

विजयनगरम घाट को दक्षिण भारत के पूर्वी विजयनगरम रियासत के नाम पर रखा गया था। विजयनगरम के महाराजा ने इस घाट के निर्माण करवाया है। यह एकमात्र घाट है जो आंध्र प्रदेश का प्रतिनिधित्व करता है। यहां भगवान शिव और निस्पपेश्वर को समर्पित मंदिर हैं। घाट दो विशिष्ट संपत्ति संबंधित ट्रस्टों के स्वामित्व में हैं।


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