विजयवाड़ा: एक बहुत पुराना शहर, जिसने नएपन को भी बांह खोलकर गले लगाया है

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मेरी दक्षिण यात्रा मुझे विजयवाड़ा ले आयी थी। आंध्रप्रदेश के सबसे चर्चित और पुराने शहरों में से एक। कृष्णा नदी के तट पर बसे इस शहर का इतिहास बहुत पुराना है। इतना पुराना कि चीन यात्री ह्वेन त्सांग ने भी अपनी पुस्तक में इसका वर्णन किया है। बंगाल की खाड़ी से 70 किमी दूर बसे इस शहर ने अपने अंदर इतिहास को समेटे रखा है। जिसको जानने-पहचानने के लिए मैं बेकरार थी।

मेरे पास सिर्फ एक दिन था। इस शहर के इतिहास और दिलचस्प कहानियों को जानने के लिए। आस-पास के लोगों से पता चला कि रेलवे स्टेशन से 4-5 किमी दूरी पर है कनक दुर्गा मंदिर। ये शहर अपनी कहानियों से भी ज्यादा खुबसूरत है। रास्ते में दिखने वाली हर दीवार पर रंग-बिरंगी वॉल पेंटिंग बनी हुई थी। कहीं फूल, कहीं बच्चे, तो कहीं जंगल का दृश्य था। इन पेंटिंग को निहारते हुए कब कनक दुर्गा मंदिर आ गया पता ही नहीं चला। एक बात तो आपको बताना ही भूल गई, विजयवाड़ा रेलवे स्टेशन से एक बस चलती है जो आपको कनक दुर्गा मंदिर ले जाती है। देखने में ये बस चक्कों वाली पालकी लगती है।

कनक दुर्गा मंदिर

इंद्रकीलाद्री पहाड़ पर बने इस मंदिर की यहां वही मान्यता है, जो उत्तर भारत में वैष्णों देवी मंदिर की है। माना जाता है, भगवान शिव ने पांडवों में से एक को प्रसन्न होकर दर्शन दिया।,तब अ्रर्जुन ने ही इंद्रकीलाद्री पहाड़ी पर विजयवाड़ा को बसाया। इसी के साथ बनवाया कनक दुर्गा मंदिर को। मंदिर पहुंचने के लिए आपको 180 सीढ़ियां चढ़नी होती है और यहां जूते-चप्पल मंदिर परिसर के एक इंच अंदर भी तक अलाउड नहीं है। तो अप्रैल की चिलचिलाती हुई गर्मी में मन मारकर मैंने अपनी चप्पलों को काउंटर पर जमा करवाया और सीढ़ियों की तरफ बढ़ चली। यहां लोगों की भीड़ जमा थी। कई नवविवाहित जोड़े भी यहां मौजूद थे। दूर से देखने पर सीढ़ियों के पास कुछ लोग पूजा करते हुए दिख रहे थे। सीढ़ियों पर पीले रंग का पेंट हो रखा था। पर नजदीक जाने पर पता चला वो पेंट नहीं, हल्दी और रोली है।

यहां की मान्यता है कि जो कोई मन्नत रखता है, वो पूरी 180 सीढ़ियों पर हल्दी-रोली का टीका लगाते हुए मंदिर तक पहुंचता है। जैसे जैसे मैं आगे बढ़ती गई तो कई जगह पान-पत्ते पर कपूर जलता हुआ भी पाया। इस कड़क धूप में भी लोगों के जोश में कोई कमी न थी। किसी तरह मैं ऊपर तो पहुंच गई थी। मंदिर के बीचोबीच था 25 फीट ऊंचा सोने के मंडप वाला मंदिर। लोग उसकी परिक्रमा लगा रहे थे। इंद्रकीलाद्री की पहाड़ियां पर कुछ गुफाएं भी थीं। कुछ पर भित्ति चित्र बने हुए थे। विजयवाड़ा की पहचान बन चुके इस मंदिर से आपको पूरा विजयवाड़ा शहर का एरियल व्यू देखने को मिलेगा। रिहायशी इलाके भी और कृष्ण नदी के खुबसूरत तट भी।

उंदावली गुफा

दूसरा पड़ाव था कनक दु्र्गा मंदिर से 7 किमी दूर बनी उंदावली गुफा। अखंड शिल्प कला का उत्कीर्ण उदाहरण है ये। बाहर से देखने में बहुत सादा लगेगा। पर जैसे जैसे आप इसके नजदीक जाएंगे इतिहास के कई पन्ने आपके सामने खुल कर सामने आने लगते हैं।

इस गुफा को बनवाया था विष्णुकुंड़ी राजाओं ने। माना जाता है, इस गुफा को विष्णु के अवतारों को समर्पित किया गया था। सालों बाद बौद्ध भिक्षुओं ने यहां डेरा जमा लिया। उन्हें ये जगह इतनी पसंद आयी कि उन्होंने इस जगह को अपने ध्यान का केंद्र बना लिया था। इस गुफा में कई धर्मों की छटा देखने को मिलती है। निचले हिस्से की दीवारों पर विष्णु के अवतारों को उकेरा गया है। खंभों पर भी कई भित्ति चित्र मिलते हैं।

पर ध्यान से। छत पर लटके चमगादड़ आपको डरा सकते हैं। और आपकी चहलकदमी वहां बैठे प्रेमियों को। एक ऐसा ही वाकया है, जब मैं उन कलाकृतियों को अपने कैमरे मैं कैद कर रही थी। तभी मेरे कैमरे के रेंज में एक युगल आ गए। वो और मैं, तीनों लोग असहज महसूस करने लगे। मैं सॉरी बोल कर आगे बढ़ गई। इन सूनसान पड़ी प्राचीन स्मारकों को ये युगल जोड़े कितना जीवंत कर देते हैं। बस दीवारों पर लिखना छोड़ दें तो और अच्छी बात।

दूसरी मंजिल पर बौद्ध धर्म से जुड़ी कई कलाकृतियां मिलेंगी। साथ ही वहां बहुत विशाल सोए हुए बुद्ध की प्रतिमा भी है। कई हिस्सों में जैन धर्म से जुड़े चित्र भी हैं। जिससे माना जा सकता है कि कुछ जैन यात्री भी यहां से हो कर गुजरे थे। गुफा में उकेरे गए चित्र बहुत सटीक और महीन है। लगता है जैसे मशीन से बनाए गए हैं। कौन कह सकता है कि गुफाएं 7वी सदी से पहले की बनी हुई है।

भवानी द्वीप

अब शाम हो चुकी थी। तो मैं चल पड़ी भवानी द्वीप की ओर। महज 60 रुपए में नाव आपको कृष्णा नदी के बीचोबीच बसे भवानी द्वीप में छोड़ और ले आती है। यह कृष्णा नदी के सबसे बड़े नदी द्वीपों में से एक है। आज यह द्वीप एक चर्चित पर्यटन स्थल के रूप में प्रचलित है। यह जगह स्वीमिंग से लेकर बोटिंग तक की सुविधाओं से लैस है।आंध्रप्रदेश पर्यटन विकास निगम इस स्थान का बेहतरीन तरीके से रखरखाव कर रहा है। साथ ही इस द्वीप पर ऐडवेंचर स्पोर्ट्स और वाटर स्पोर्ट्स की सुविधा भी है। भवानी द्वीप छुट्टी बिताने का एक आदर्श स्थान है।

विजयवाड़ा का दिन जितना तपता और परेशान करने वाला होता है, यहां की शाम उतनी ही रूह को सुकून देने वाली लगती है। शाम की लालिमा कृष्णा नदी को और भी सुंदर बना देती है। यह जगह परिवार और दोस्तों के साथ आने के लिए परफेक्ट है। यहां बहुत अच्छे लॉज भी हैं। शाम को यहां वॉटर और लेजर शो भी होता है। आप यहां पूरा एक दिन बिता सकते हैं।

किनारे खड़े होकर अभी मैं कृष्णा नदी को निहार ही रही थी कि थोड़ी दूरी पर लंबाई में रंगबिरंगी लाइटें जलने लगीं। वो कुछ और नहीं प्रकाशम बैराज था। घूमते-घूमते टाइम का पता ही नहीं चला। अब वापस जाने वाली आखिरी बोट का वक्त हो चला था। मैं भाग कर बोट तक पहुंची। अगर ये छूट जाती तो आज रात इस द्वीप पर ही गुजारनी पड़ती।

प्रकाशम बैराज

हवा से हमारी नाव डोल रही थी। तट तक आते-आते हवाएं और तेज हो गई। हम वापस तट तक पहुंचे। रात हो चुकी थी। तेज हवाएं, कृष्णा नदी और प्रकाशम बैराज की चमक रात को मनभावन बना रही थी।

प्रकाशम बैराज 1223 मीटर लंबाई में बना हुआ है। इस बैराज का नाम 1953 में आंध्रप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री टंगटूरी प्रकाशम के नाम पर रखा गया है। शाम होते ही इस पर तरह-तरह की लाइट्स जलने लगती हैं। जिनके जलने का रंग और वेग बदलता रहता है। इन मचलती हुई रोशनी से लगता है मानो बैराज पर किसी तरह का लाइट शो हो रहा है।

इस तरह कृष्णा नदी के तट पर बसे विजयवाड़ा में मेरा एक दिन पूरा हुआ। देखने के लिए और भी बहुत कुछ था पर मुझे अभी बहुत दूर जाना था। सही मायनों में विजयवाड़ा शाम का शहर है। यहां की शाम बहुत खुबसूरत है। इस शहर में दोबारा आउंगी। पर इस बार टाइम लेकर। एक दिन में जहां इतना कुछ देखा। तो सोचिए इस शहर में क्या कुछ छुपा होगा। जिसे मैने अभी तक नहीं देखा। गहन इतिहास, कई सारी कहानियां और खूब सारा रोमांच ही इस शहर की पहचान है। विजयवाड़ा को बाय कह कर निकल गई में एक नए शहर की ओर।


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