वो लोककला जिसके कायल थे खुद रवींद्रनाथ टैगोर

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पश्चिम बंगाल लोक संस्कृतियों के मामले में धन्य राज्य है। यहां के संगीत की अपनी एक बहुत पुरानी और सुरीली विरासत है। बंगाल में घूमते-घूमते हमने बहुत सी चीजें देखीं और अभी तो बहुत कुछ देखना बाकी था। उनमें से एक था, अपनी ही धुन में डूबे बाउल कलाकार। बाउल के बारे में लोगों से सुना तो बहुत था पर उनके गान को सुनने का मौका अभी तक हमें मिला नहीं था। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में ये कलाकार बहुतायत रहते हैं। बाउल मूलतः सन्यासी होते हैं, जिनमें से अधिकांश घर-बार छोड़ अपनी साधना में मगन रहते हैं, कुछ गृहस्थ धर्म निभाते हुए इस कला को बरकरार रखे हुए हैं।

बाउल कलाकारों ने मिलने को आकुल मेरे मन ने सोशल मीडिया पर उन्हें तलाशना शुरू किया। हमें एक वीडियो के नीचे बाउल गायक लक्ष्मण दास का कॉन्टैक्ट नंबर मिल गया। हम उनसे मिलने पहुंच गए बीरभूम जिले के बोलपुर में स्थित शांतिनिकेतन में। आगे पढ़ने से पहले ये जान लीजिए, यूनेस्को ने बाउल संगीत को खतरे में पड़ी विरासत की सूची में डाला है। हालांकि बाउल संगीत वहां बांग्लादेश के नाम से दर्ज है लेकिन इसकी जड़े भारत में बहुत गहरी हैं।

बंग भूषण लक्ष्मण दास बाउल

बाउल है क्या

लक्ष्मण दास ने हमें बताया, ‘बाउल संगीत बंगाल की आत्मा है। बाउल का अर्थ होता है पागल। ईश्वर के प्रेम में पागल। गेरुआ रंग पहने हाथ में एकतारा लिए, पैरों में घुंघरू बांधे बाउल गायक गांव-गांव फिरा करते थे और लोगों पर ही आश्रित रहा करते थे। कहा जाए तो हिन्दुओं के सूफी हैं बाउल। आवाज ऐसी कि सीधा रूह में उतरे। रवींद्रनाथ टैगोर भी बाउल के मुरीद थे। हर साल अपने घर पर होने वाली कवि सम्मेलन में बाउल गायकों को जरूर बुलाया करते थे। सुप्रसिद्ध बाउल गायक श्री पूर्ण दास जी की प्रसिद्धि तो देश ही नहीं विदेशों में है। बाहर के देशों में बाउल संगीत की बहुत मांग है लेकिन अपने ही देश में ये तिरस्कृत है। या यूं कहें हमने ही लोकगीतों को बोरिंग समझ कर छोड़ दिया है।’

शांतिनिकेतन में आपको हर गली में कोई न कोई  बाउल गायक मिल जाएगा जिसके हाथों में एक तारा हो, जुबान पर आध्यात्मिक और अद्भुत बाउल गान। यहां घूमते-घूमते आपके कानों में अचानक बाउल के सुर गूंजने लगते हैं। वहां हमारी बहुत से बाउल कलाकारों से बात हुई। उनकी सादगी देखकर दिल झूम उठा। सादा गाना, सादा म्यूजिक। कोई एक्सट्रा ताम झाम नहीं। पर सुनने में इतना मधुर कि मगन हो कर सुनते ही जाओ, बस सुनते ही जाओ। अगर आपकी ट्रिप बने पश्चिम बंगाल जाने की और शांतिनिकेतन घूमने का विचार हो तो बाउल संगीत तो जरूर सुनकर ही आइएगा।

शांतिनिकेतन में बाउल कलाकार

कला के साथ साथ कलाकारों की हालत खस्ता

अपनी ही धरती बंगाल में भी बाउल संगीत दम तोड़ रहा है। कहने को तो सरकार 1500 रुपए हर महीने भत्ता देती है। कुछ को भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों की वजह से ये भी नसीब नहीं होता। कई कलाकारों से बात करके पता चला कि बहुत कम बाउल गायक ही अच्छी हालत में हैं। ज्यादातर के पास कच्चे मकान हैं। कई विदेश भी जा चुके हैं पर पैसों के नाम पर उनके पास कुछ नहीं। उनमें से एक कलाकार की बेटी की शादी तो किसी विदेशी के रहमोकरम पर हुई है।

अपनी विरासतों, लोककलाओं पर हम ही ध्यान नहीं देंगे तो आने वाली पीढ़ी कैसे जान पाएगी कि भारत कैसे इतना महान देश है। ऐसे ही सब नष्ट होता रहा तो धीरे-धीरे हमारे पास सिर्फ कुछ नहीं होगा सिवाय बड़े मकानों और गाड़ियों के। कला के नाम पर होंगे कुछ वीडियो और रिकॉर्डिंग। क्या सच में हम ऐसा ही चाहते अपने बच्चों का भविष्य, टीवी और फोन में डूबा हुआ। हमारी विरासत को सजा-संवारकर हमारे हाथों में ही है। क्या हम इसे खत्म कर उसके अस्तित्व को बस किसी डॉक्यूमेंट्री में ही देखना चाहते हैं। बिलाशक, नहीं।


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