बंगाल की लोकल ट्रेनों में सफर करतीं दिल्ली की दो लड़कियों के किस्से

रास्ते में पड़ा एक स्टेशन

पश्चिम बंगाल, एक ऐसा राज्य जहां जाने के सपने मैं दिन में भी देखा करती थी। वहां की अलहदा संस्कृति, अपने में हजारों रंग समेटे लोक कलाएं, भांति-भांति के स्वादिष्ट पकवान और ढेर सारी मिठाइयां। जी करता था कि बस भागकर वहां पहुंच जाऊं। अपने चित्त की इस अदम्य इच्छा को पर लगाने मैं पहुंच गई पश्चिम बंगाल। साथ में थी मेरी एक दोस्त। दिल्ली से सियालदाह का सफर बड़ा ही आम सा रेलवे सफर था। स्टेशनों पर बदलते नाम और लोगों की पहचान। बंगाल के स्टेशनों से गुजरते वक्त भाषा को छोड़ मुझे कुछ भी नया नहीं लगा।

असली मजा तो आया, बंगाल की लोकल ट्रेनों में सफर करके। हमने प.बंगाल के पांच जिलों को रेल मार्ग से नापा। हम दो लड़कियों को ‘अकेला’ सफर करते देख किसी और जगह की तरह ही यहां भी लोग पहला सवाल करते, डर नहीं लगता? साथ में जेंट्स नहीं है कोई? अरे बाप रे, आप दोनों तो बड़े साहसी हो, घरवाले अनुमति दे दिए आसानी से? अच्छा, दिल्ली से हो! इन सब अलग-अलग सवालों का तकरीबन एक सा जवाब देते-देते हम दोनों पक चुके थे। फिर हमारा एंकाउंटर हुआ कुछ विचित्र किंतु सत्य टाइप के सवालों से।

आप तस्वीरें खींचकर दिल्ली में बेच देते हो?

ये वाकया है हमारे बर्धमान से बड़ाभूम के सफर के बीच का। शाम हो चली थी। हम शहरी इलाकों से काफी दूर चले आए थे। ट्रेन स्टेशन पर रुकी हुई थी। हमने कॉफी ले ली, पीने लगे। मेरी तबियत उस दिन कुछ नासाज थी। सीट खाली थी तो मैं लेट गई। दोस्त मेरे लिए चिप्स और चॉकलेट ले आई। तभी वहां सादी वर्दी में दो पुलिस वाले आए। बड़े ही हक के साथ बहन बोला और हमारे साथ चॉकलेट खाने लगे। उनका खुला बर्ताव देखकर हम भी सहजता से उनसे बतियाने लगे। उन्होंने हमारे बारे में पूछा-पाछा, अपने बारे में बताया। हम बड़ाभूम में जिस गांव में जा रहे थे, उसका नाम उन्हें नहीं मालूम था। पुलिस होने के कारण आदतन वो शक करने लगे हम पर कि आखिर हमारे मंसूबे क्या हैं।

भीड़भाड़ वाले इलाके से निर्जन इलाके की तरफ भागती ट्रेन

जब हमने उन्हें बताया कि हम पारंपरिक छाऊ नृत्य कवर करने जा रहे हैं। तो उनमें से एक ने कहा, आप लोग आते हो, गांव के लोगों का तो भला नहीं होता लेकिन इन लोगों की फोटो खींचकर कुछ जर्नलिस्ट लोग बेच देते हो। आप भी बेच दोगे क्या? हमने उन्हें समझाया, चलत मुसाफ़िर के उद्देश्यों के बारे में बताया, अपनी वेबसाइट और यूट्यूब चैनल दिखाया। और उन्हें यकीन दिलाया कि हमारा मकसद ही है, भारत की तमाम छिपी खूबसूरती को सबके सामने लाना, कलाकारों को उचित सम्मान दिलाने में भरसक प्रयत्न करना। हमारी बातों से आश्वस्त होकर वो बोले कि तुम लोग बड़ा निडर है, ऐसी जगह पर जा रहा, जहां का हमको नाम नहीं मालूम। एक जर्नलिस्ट के पास ही इतना साहस होता है।

आप हिंदी में क्यों पढ़ रहे हो?

मेरी आदत है कि ट्रेन के सफर में लोगों की शक्लें और फेरीवालों से बतकही कर उकताने से अच्छा है, अपनी अधूरी पढ़ी किताब को पूरा करना। उस दिन हम हावड़ा से खड़गपुर जा रहे थे, मैंने सफर लंबा जान बैग से अपनी किताब निकाल ली। और खिड़की किनारे बैठकर पढ़ने लगी। मेरे आजू-बाजू के लोग थोड़ा प्रभावित हुए। एक ने थोड़ी देर बाद पूछा, क्या पढ़ रहे? मैंने बोला, इतिहास की किताब है। उनका अगला सवाल था, लेकिन आप तो काफी पढ़े-लिखे लग रहे, हिंदी में क्यों पढ़ रहे? मैंने बोला, हिंदी में ज्यादा मजा आता है। उन्होंने प्रत्युत्तर दिया, अंग्रेजी में पढ़ा करो, ज्यादा सही रहता है। मैं मंद मंद मुस्कुरा दी।

ईसाई मतलब विदेशी!?

ट्रेन अपनी रफ्तार से भाग रही थी, मैं और मेरी दोस्त तुरंत खरीदे गए झालमुड़ी का आनंद ले रहे थे। एक सज्जन ने उत्सुकतावश पूछा, कहां से हैं आप? जवाब, दिल्ली से। दूसरा सवाल तपाक से आया, हिंदू हो? मैंने बोला, हां। सज्जन ने दोस्त की तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तो मैंने कहा, वो क्रिश्चियन हैं। बेचारे मासूस से सज्जन अचानक से बोल पड़े, अच्छा मतलब विदेशी हैं। मैंने कहा, अरे नहीं हिंदुस्तानी हैं। उसने अबूझ भाव के साथ कहा कि हिंदू नहीं है न।

झालमुड़ी के साथ नारियल का एक टुकड़ा भी देते हैं यहां

हमारी ट्रेन की यात्राओं में खूब सारे प्यारे लोग भी मिले, दिल खुश कर देने वाली मुस्कुराहटें लिए बच्चे मिले। खूबसूरत गहने पहनीं बंगाली महिलाए मिलीं, संदेश ऑफर करते हुए सहयात्री मिले। पश्चिम बंगाल की ये पूरी यात्रा एक अलग माहौल, अलग वेश-भूषा, भाषा, सोचने का भिन्न नजरिया लिए हुई थी। ये जो ऊपर सारे वृतांत बताए मैंने, इन सबने मिलकर हमारी यात्रा को खूब यादगार और रोचक बना दिया।


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